NEET प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ज्यादती की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई पांच सदस्यीय कमेटी

नीट परीक्षा पेपर लीक मामले को लेकर देश भर में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की तरफ से कथित तौर पर की गई ज्यादती की जांच के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने के लिए पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी (HPEC) का गठन कर दिया है। इस कमेटी की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर सुभाष रेड्डी करेंगे। कोर्ट के इस फैसले से उन छात्रों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्होंने प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए थे।
कटेमी में कौन-कौन शामिल और क्या होगा काम
सुप्रीम कोर्ट की इस विशेष कमेटी में पूर्व जज के अलावा एक पूर्व हाईकोर्ट जज, एक रिटायर्ड डीजीपी, एक पूर्व सीबीआई डायरेक्टर और एक अन्य रिटायर्ड डीजीपी को शामिल किया गया है। कोर्ट ने यह भी ध्यान रखा है कि इन सभी सदस्यों को उन राज्यों से बाहर का रखा जाए जहां पर ये घटनाएं हुई थीं, ताकि जांच पूरी तरह से निष्पक्ष हो सके। इस कमेटी के पास मुख्य रूप से जंतर-मंतर और अन्य जगहों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान कानून लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग, सुरक्षाकर्मियों पर हुई हिंसा और महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न की रिपोर्टों की जांच करने की जिम्मेदारी होगी। इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी ANI News की रिपोर्ट में विस्तार से दी गई है।
चीफ जस्टिस और केंद्र सरकार का रुख
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ तौर पर कहा कि देश के संविधान के आर्टिकल 19 के तहत हर नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार मिला हुआ है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि अदालत पीड़ित छात्रों को तुरंत न्याय और मदद दिलाने के लिए जरूरी ढांचा उपलब्ध कराएगी। वहीं, केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार उन छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है, जिनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। इस संबंध में ANI News के हवाले से पहले भी खबरें सामने आई थीं कि कोर्ट एक हाई-पावर्ड पैनल बनाने पर विचार कर रहा था।
कानूनी कार्रवाई और पुरानी घटनाएं
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह संविधान के आर्टिकल 142 के तहत मिलने वाली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है, ताकि जिन छात्रों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज नहीं हैं, उनकी एफआईआर को रद्द किया जा सके। दूसरी तरफ, दिल्ली पुलिस ने अदालत को पहले ही यह जानकारी दी थी कि प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पूरी तरह से राज्य के वैध हितों को ध्यान में रखकर किया गया था, जिस पर पुलिस की कार्यशैली को लेकर सवाल उठे थे। आपको बता दें कि यह पूरा मामला 20 जुलाई 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी की अगुवाई में संसद की तरफ निकाले गए मार्च और उसके बाद हुए कई अन्य प्रदर्शनों के सिलसिले में दाखिल की गई याचिकाओं के बाद सामने आया है।