चीन के जातीय एकता कानून पर ताइवान का कड़ा रुख, राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने दुनिया से मांगा सहयोग

Aanya4 August 20262 min read55 viewsWorld
चीन के जातीय एकता कानून पर ताइवान का कड़ा रुख, राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने दुनिया से मांगा सहयोग

चीन द्वारा लागू किए गए नए 'एथनिक यूनिटी' यानी जातीय एकता कानून को लेकर ताइवान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे चीन के इस विवादास्पद कदम का विरोध करें। ताइपे में आयोजित 10वें केटागालन फोरम–इंडो-पैसिफिक सिक्योरिटी डायलॉग के दौरान राष्ट्रपति लाई ने इस कानून को ताइवान की संप्रभुता के लिए एक सीधा खतरा करार दिया। उनका मानना है कि यह नया कानून केवल क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश करता है।

कानून से जुड़े विवाद और चिंताएं

चीन में 'लॉ ऑन द प्रमोशन ऑफ एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस' को 1 जुलाई से प्रभावी किया गया है। चीन सरकार का दावा है कि इस कानून का मकसद देश में सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है। हालांकि, ताइवान और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस दावे पर सवाल खड़े किए हैं। राष्ट्रपति लाई का कहना है कि यह कानून राजनीतिक सेंसरशिप को बढ़ावा देता है और सीमा-पार दमन के नए रास्ते खोल सकता है। विशेष रूप से जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी चिंता जताई गई है। उइगर समुदाय से जुड़े नागरिक संगठनों ने भी इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है, क्योंकि उनका मानना है कि यह कानून सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचा सकता है।

लोकतांत्रिक देशों के लिए चेतावनी

राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ताइवान शांति और लोकतंत्र के रास्ते पर अडिग है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन की ऐसी दमनकारी नीतियों के सामने ताइवान न केवल खुद को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक सहयोग के जरिए इसका मुकाबला भी करेगा। उन्होंने लोकतांत्रिक देशों से आग्रह किया कि वे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक साथ आएं। उनके अनुसार, चीन की ये गतिविधियां क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा हैं। इस मामले पर अधिक जानकारी के लिए आप हिन्दुस्थान समाचार की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।

चीन और ताइवान के बीच के ये पुराने मतभेद इस नए कानून के साथ एक बार फिर सतह पर आ गए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कानून को किस प्रकार देखा जा रहा है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल ताइवान ने इस मुद्दे पर अपना रुख बिल्कुल साफ कर दिया है कि वे किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

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