अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump और इसराइल अब सऊदी अरब पर दबाव बना रहे हैं कि वह भी Abraham Accords समझौते का हिस्सा बने। ट्रंप ने सऊदी अरब को इस समझौते पर तुरंत साइन करने के लिए एक तरह का अल्टीमेटम दिया है। इस कोशिश का मकसद सऊदी अरब और इसराइल के बीच रिश्तों को सामान्य करना है।

इस समझौते के तहत अब तक UAE, Bahrain और Morocco ने इसराइल के साथ अपने रिश्ते ठीक किए हैं। अब इस लिस्ट में सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली देश को शामिल करने की कोशिश की जा रही है। ट्रंप ने इसे एक अनिवार्य अनुरोध के रूप में पेश किया है।

सऊदी अरब की अपनी शर्तें

सऊदी अरब ने अपनी स्थिति बहुत साफ रखी है। सऊदी सरकार का कहना है कि इसराइल के साथ रिश्ते तभी सुधरेंगे जब फिलिस्तीन के लिए एक अलग देश बनाने का ठोस रास्ता निकलेगा और टू-स्टेट सॉल्यूशन लागू होगा। Crown Prince Mohammed bin Salman ने बार-बार कहा है कि फिलिस्तीनी मुद्दा सुलझना किसी भी समझौते के लिए पहली शर्त है।

जानकारों का मानना है कि अगर सऊदी अरब बिना किसी समाधान के इस समझौते पर साइन करता है, तो अरब राजनीति में फिलिस्तीनी मुद्दा पूरी तरह कमजोर पड़ सकता है।

अन्य देशों पर भी दबाव और ईरान का मामला

मई 2026 में जारी ट्रंप के इस अल्टीमेटम में सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि अन्य देशों को भी निशाना बनाया गया था। इसमें निम्नलिखित देश शामिल थे:

  • Qatar
  • Pakistan
  • Turkey
  • Egypt
  • Jordan

ट्रंप ने साफ कहा था कि जो देश इस बात को नहीं मानेंगे, उन्हें ईरान के साथ होने वाले एक मौजूदा समझौते से बाहर रखा जाएगा।

क्षेत्रीय तनाव और सैन्य गठबंधन

Abraham Accords अब कुछ देशों के लिए सिर्फ आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सैन्य गठबंधन का रूप ले चुका है। हालांकि, सऊदी अरब का इसराइल के साथ ऐसा कोई मिलिट्री पार्टनरशिप नहीं है।

वर्तमान में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय नीतियों पर बातचीत का स्तर गिरा है। इसराइल द्वारा बस्तियों का विस्तार और गाजा में मानवीय हालात इस शांति प्रक्रिया और टू-स्टेट सॉल्यूशन की उम्मीदों को और मुश्किल बना रहे हैं।

Praggya Singh sabal

Journalist from Noida. Covering Delhi, NCR and National Updates.