संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और उसके अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 9 जून 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक के दौरान इन देशों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल हमलों पर गहरी चिंता जताई। यूएई समेत कुल 8 देशों ने मिलकर ईरान पर लगे प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने की मांग की है क्योंकि ईरान की परमाणु क्षमताएं अब बेहद संवेदनशील स्तर पर पहुंच चुकी हैं।

यूएई और उसके सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ क्यों की कड़ी मांग?

10 जून 2026 को आई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्रांस, बहरीन, डेनमार्क, ग्रीस, लातविया, यूएई, ब्रिटेन और अमेरिका ने एक साझा बयान जारी किया है। इन देशों का कहना है कि ईरान लगातार परमाणु नियमों का उल्लंघन कर रहा है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की अनदेखी करके अपनी बैलिस्टिक मिसाइल योजना को आगे बढ़ा रहा है।

  • अत्यधिक यूरेनियम जमा करना: ब्रिटेन के अधिकारियों ने बताया कि ईरान ऐसा अकेला गैर-परमाणु देश बन गया है जिसके पास 400 किलोग्राम से अधिक अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) जमा हो चुका है।
  • नियमों का उल्लंघन: ईरान पर आरोप है कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी कर हथियार और मिसाइल तकनीक का निर्यात कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में किसने क्या कहा?

इस मामले को लेकर सुरक्षा परिषद की बैठक में तीखी बहस देखने को मिली। फ्रांस के प्रतिनिधि जेरोम बोनाफोंट ने चेतावनी दी कि ईरान के पास अब इतनी मात्रा में यूरेनियम है जिससे परमाणु हथियार बनाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं अमेरिकी प्रतिनिधि टैमी ब्रूस ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षक भी ईरान के परमाणु दावों की पूरी जांच नहीं कर पा रहे हैं।

दूसरी ओर, चीन और रूस ने इन प्रतिबंधों का विरोध किया है। चीन के प्रतिनिधि सुन लेई ने प्रतिबंधों को फिर से लागू करने के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। इसके बाद अमेरिकी प्रतिनिधि ने रूस और चीन पर ईरान की प्रतिबंध कमेटी के काम में बाधा डालने का आरोप लगाया।

Frequently Asked Questions (FAQs)

यूएई के साथ इस मांग में कौन-कौन से देश शामिल हैं?

यूएई के साथ इस संयुक्त मांग में फ्रांस, बहरीन, डेनमार्क, ग्रीस, लातविया, यूनाइटेड किंगडम (UK) और संयुक्त राज्य अमेरिका (US) शामिल हैं।

सुरक्षा परिषद में चीन और रूस का क्या रुख रहा?

चीन और रूस ने ईरान पर प्रतिबंध लगाने के कानूनी और प्रक्रियात्मक आधारों का विरोध किया और अमेरिका के इस प्रस्ताव पर असहमति जताई।