UAE और Qatar ने ईरान को युद्ध हर्जाने के तौर पर दिए अरबों डॉलर, 17 अगस्त से पहले डील होने की उम्मीद

खाड़ी देशों और ईरान के बीच चल रहे लंबे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ी खबर सामने आई है। UAE और Qatar ने युद्ध के हर्जाने के रूप में ईरान को अरबों डॉलर का भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की है। यह समझौता 17 अगस्त की समय सीमा से ठीक पहले हुआ है, जिससे क्षेत्र में शांति की नई उम्मीदें जगी हैं। इस बड़े फैसले के बाद से पूरे गल्फ क्षेत्र में हलचल है और आम लोगों के मन में भी सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
समझौते का विवरण और वित्तीय लेनदेन
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन दोनों देशों ने मिलकर 9 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 108 अरब अमेरिकी डॉलर की भारी-भरकम राशि ईरान को देने का निर्णय लिया है। सूत्रों के मुताबिक, UAE ने अपना हिस्सा पहले ही ईरान को ट्रांसफर कर दिया है। यह पूरा घटनाक्रम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस घोषणा के बाद तेजी से आगे बढ़ा, जिसमें उन्होंने ईरान पर हमले रोकने का निर्णय लिया था। हालांकि, इस पूरे मामले पर ईरान की तरफ से शुरुआती दौर में बातचीत से इनकार किया गया था, लेकिन बाद में चीजें स्पष्ट होती गईं।
मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग और अन्य देशों की स्थिति
यह मुआवजा समझौता 17 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति पज़ेशकियन के बीच हस्ताक्षरित एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का नतीजा है। ईरान ने मूल रूप से सभी छह GCC देशों से कुल 28 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 336 अरब डॉलर की मांग रखी थी। इस हिसाब से हर देश के हिस्से में लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 54 अरब डॉलर का बोझ आ रहा है।
वर्तमान में, सऊदी अरब इस भुगतान को लेकर थोड़ा हिचकिचा रहा है। उनका तर्क है कि इस युद्ध में इजरायल को भी अपना हिस्सा चुकाना चाहिए। अगर सऊदी अरब इस पर राजी हो जाता है, तो माना जा रहा है कि कुवैत, बहरीन और ओमान भी जल्द ही इस समझौते में शामिल हो जाएंगे।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य और अन्य मांगे
ईरान अभी भी Strait of Hormuz पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के दावे को लेकर सख्त है। ईरान की योजना है कि वह ओमान के साथ मिलकर इस समुद्री रास्ते पर टोल वसूलेगा, क्योंकि अमेरिका पिछले पांच महीनों में बल प्रयोग करके भी इस रास्ते पर कब्जा नहीं जमा सका।
ईरान की कुछ अन्य महत्वपूर्ण मांगें भी अभी बरकरार हैं:
- अमेरिकी प्रतिबंधों का हटना, जो तेल व्यापार को प्रभावित करते हैं।
- गल्फ देशों और अमेरिका में जमे हुए 10 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 120 अरब डॉलर के ईरानी एसेट को रिलीज करना।
इस बीच, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश अभी भी सख्त रवैया अपनाए हुए हैं, जिससे तुरंत ईरानी संपत्ति के अनफ्रीज होने की संभावना कम दिखाई देती है। जुलाई के दूसरे पखवाड़े में Bab al-Mandeb Strait में हुए हूती हमलों ने भी रेड सी और स्वेज नहर के यातायात पर बुरा असर डाला है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सऊदी अरब के कच्चे तेल के एक्सपोर्ट पर भी दबाव बना हुआ है।