अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही जंग अब खत्म होने वाली है। दोनों देश एक नए शांति समझौते (Ceasefire) की कगार पर हैं, जिसमें पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई है। लेकिन इस बीच Gulf देशों की चिंता बढ़ गई है और वे अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के अलावा अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता
पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता (MOU) होने की उम्मीद है। अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस डील के होने की 80 से 85 प्रतिशत संभावना है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया कि समझौते का अंतिम टेक्स्ट तैयार हो चुका है और अब अगले कदमों पर काम चल रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी कहा कि इस्लामाबाद MOU अब बहुत करीब है और जल्द ही इसकी जानकारी दी जाएगी।
समझौते की शर्तें और विवाद
इस डील में 60 दिनों के लिए युद्धविराम बढ़ाने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को व्यापारिक जहाजों के लिए दोबारा खोलने की बात कही गई है। साथ ही ईरान ने वादा किया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। हालांकि, पैसों को लेकर विवाद जारी है। ईरान की सरकारी मीडिया ने दावा किया कि इस डील के तहत उसे 24 अरब डॉलर के फंसे हुए पैसे वापस मिलेंगे, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति JD वैन्स ने इस खबर को गलत बताया है। अमेरिका का कहना है कि समझौते में किसी भी तरह के नकद पैसे देने की बात नहीं हुई है।
Gulf देशों की नई सुरक्षा योजना
जंग के दौरान Gulf देशों के एयरपोर्ट, बंदरगाह और ऊर्जा केंद्रों पर ईरानी ड्रोन और मिसाइलों ने हमले किए थे। इससे सऊदी अरब, UAE और कतर जैसे देशों का अमेरिका पर से भरोसा कम हुआ है। उन्हें लगता है कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी उनकी रक्षा के लिए काफी नहीं है।
अब ये देश अपनी सुरक्षा के लिए नए रास्ते खोज रहे हैं। वे यूरोप और यूक्रेन जैसे देशों से संपर्क कर रहे हैं ताकि ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोकने की नई तकनीक सीख सकें। UAE अब ईरान के साथ तनाव कम करने के लिए उसके फंसे हुए फंड्स को रिलीज करने की तैयारी में है। जानकारों का कहना है कि Gulf देश अब बाहरी ताकतों पर निर्भरता कम करके आपसी कूटनीति और क्षेत्रीय शांति पर ज्यादा जोर देंगे।
