अमेरिका की ईरान पर सख्त पाबंदियां, लेकिन चीन और रूस के साथ मजबूत व्यापार को तोड़ना मुश्किल.

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध और अलगाव की एक नई नीति की शुरुआत की है, जिसे आर्थिक डी-डे कहा जा रहा है। इस रणनीति का मुख्य मकसद तेहरान को किसी भी तरह की मदद पहुंचाने वाले देशों पर इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाना है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव Scott Bessent ने घोषणा की कि वाशिंगटन को उम्मीद है कि दुनिया के सभी देश और विरोधी इस अमेरिकी रुख का समर्थन करेंगे। इस मामले में आगे की आर्थिक जानकारियां एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान साझा की जानी हैं। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग इस समय ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी पर काम कर रहा है, जिसके तहत उन चीनी रिफाइनरियों को निशाना बनाया जा रहा है जो ईरान से कच्चा तेल खरीदती हैं, साथ ही ईरान के शैडो फ्लीट यानी गुप्त टैंकरों पर भी नजर रखी जा रही है।
विश्लेषकों की क्या है राय
इन तमाम अमेरिकी कोशिशों के बावजूद विश्लेषकों का मानना है कि बड़े देशों से नियमों का पालन करवाना अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा। यूरेशिया ग्रुप के सीनियर एनालिस्ट Gregory Brew ने बताया कि अमेरिका भले ही कई तरह के उपाय लागू कर ले, लेकिन चीन के खिलाफ ऐसे कदम उठाना बेहद कठिन है। चीन साल 2025 तक ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अकेले खरीदता रहा है। कतर स्थित जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर Paul Musgrave ने मीडिया से बातचीत में कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी पांच देशों के बहुपक्षीय तालमेल के बिना चीन और रूस जैसे देशों पर एकतरफा फैसले लागू करना बहुत मुश्किल साबित होगा।
कूटनीतिक माहौल में तनाव
इस पूरे घटनाक्रम के बीच कूटनीतिक स्तर पर तनाव लगातार बना हुआ है। पिछले दिनों चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Lin Jian ने अमेरिकी दबाव को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि प्रतिबंधों और दबाव से किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता और बीजिंग ईरान की संप्रभुता का पूरा समर्थन करता है। दूसरी तरफ ईरानी अधिकारियों ने भी अमेरिकी कदम की कड़ी निंदा की है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने इन धमकियों को आर्थिक आतंकवाद करार दिया है। इसके अलावा ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने इस नीति को पिछली सैन्य कार्रवाइयों के बाद एक असफल कदम बताया और सलाहकार Mohammad Mokhber ने कहा कि ईरान बातचीत के लिए हमेशा तैयार है लेकिन कभी घुटने नहीं टेकेगा।
भारत और खाड़ी देशों पर असर
अमेरिका की ओर से यह आर्थिक दबाव किसी एक देश तक सीमित नहीं है बल्कि इसके दायरे में कई अन्य देश भी आ रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले हर देश पर 25% का भारी टैरिफ लगा रखा है, जिससे भारत, तुर्की, इराक और पाकिस्तान जैसे देश भी प्रभावित हो रहे हैं। इस बीच क्षेत्रीय स्तर पर यूएई यानी UAE ने भी बड़ा कदम उठाया। यूएई ने ईरान के साथ अपने सभी व्यापारिक और वित्तीय रिश्तों को निलंबित कर दिया है, जिससे खाड़ी क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल काफी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping की अमेरिका यात्रा भी प्रस्तावित है, जिसके चलते यह देखना अहम होगा कि वाशिंगटन ईरान और उसके मुख्य साझीदार देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को तोड़ने में कितना सफल हो पाता है।