अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते की खबरें आ रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप डील होने का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ ईरान इसे महज अटकलें बता रहा है। इसी बीच कुवैत और बहरीन पर हुए हमलों ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में डर का माहौल बना दिया है।
अमेरिका और ईरान के बीच डील का क्या है सच?
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baghaei ने 11 जून 2026 को बताया कि अमेरिका के साथ किसी भी समझौते पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। उन्होंने साफ किया कि ईरान अपनी ‘रेड लाइन्स’ से समझौता नहीं करेगा। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि एक डील तैयार हो चुकी है, जिसे अमेरिका, इजराइल, सऊदी अरब, UAE और कतर ने मंजूरी दे दी है। ट्रंप का यह भी मानना है कि ईरान के सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei ने इस डील को मंजूरी दे दी है।
कुवैत और बहरीन पर हमला और बढ़ता तनाव
राजनयिक बातचीत के दावों के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई है। अमेरिका ने 11 जून 2026 को ईरान में अपने दूसरे दिन के हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन पर हमले किए। ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी हमलों के बाद 8 अप्रैल को हुआ युद्धविराम अब बेकार हो गया है।
ईरान में फैसले कैसे लिए जाते हैं?
ईरान में किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते के लिए एक तय प्रक्रिया होती है। इसमें मुख्य भूमिका निभाने वाले संस्थान ये हैं:
- सर्वोच्च नेता: Mojtaba Khamenei के पास आखिरी फैसला लेने की ताकत है। उनके बिना कोई भी बड़ा फैसला नहीं हो सकता।
- Supreme National Security Council (SNSC): यह काउंसिल बातचीत की दिशा तय करती है, लेकिन इसके फैसले सर्वोच्च नेता की मंजूरी के बाद ही लागू होते हैं।
- विदेश मंत्रालय: इसका काम तय किए गए नियमों के तहत विदेशी नीतियों को लागू करना है।
- IRGC: सुरक्षा मामलों में इसकी बड़ी भूमिका रहती है।
बीच-बचाव की कोशिशें
इस तनाव को कम करने के लिए कतर और पाकिस्तान कोशिश कर रहे हैं। कतर के विदेश मंत्री के एक सलाहकार हाल ही में तेहरान गए थे ताकि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता निकाला जा सके।
