अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम समझौता हुआ है, जिसका सऊदी अरब ने खुले दिल से स्वागत किया है। सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने इस समझौते की तारीफ करते हुए उम्मीद जताई कि इससे पूरे इलाके में शांति और स्थिरता वापस आएगी। इस फैसले के बाद अब दोनों देशों के बीच बातचीत का नया दौर शुरू होगा।
सऊदी विदेश मंत्रालय ने 15 जून 2026 को आधिकारिक तौर पर इस समझौते का समर्थन किया। सऊदी अरब का मानना है कि यह कदम सैन्य अभियानों को खत्म करने और अगले 60 दिनों तक विस्तृत बातचीत करने के लिए जरूरी है। इस बातचीत का मुख्य मकसद एक स्थायी समझौता करना है ताकि भविष्य में कोई टकराव न हो।
पाकिस्तान और कतर की अहम भूमिका
इस डील को करवाने में पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ के तौर पर बड़ी भूमिका निभाई है। सऊदी अरब ने इन दोनों देशों के प्रयासों की सराहना की है। साथ ही, अमेरिका और ईरान ने भी इन कोशिशों का सकारात्मक जवाब दिया है।
Strait of Hormuz और व्यापार पर असर
सऊदी अरब ने इस बात पर जोर दिया है कि Strait of Hormuz में सुरक्षा और जहाजों की आवाजाही फिर से पहले जैसी होनी चाहिए। यह रास्ता वैश्विक व्यापार के लिए बहुत जरूरी है। अगर यहाँ शांति रहती है, तो इसका सीधा असर खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था और यहाँ रहने वाले प्रवासियों पर पड़ेगा, क्योंकि सामान की सप्लाई और तेल का व्यापार सुचारू रूप से चलेगा।
समझौते की मुख्य बातें
- साइनिंग सेरेमनी: इस डील पर आधिकारिक तौर पर 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड के Burgenstock रिसॉर्ट में हस्ताक्षर होंगे।
- बातचीत का समय: अगले 60 दिनों तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विस्तार से चर्चा होगी।
- अमेरिका का रुख: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि Strait of Hormuz जल्द ही पूरी तरह खुल जाएगा।
- इज़राइल की प्रतिक्रिया: इज़राइल ने साफ कर दिया है कि वह इस समझौते से बंधा नहीं है और वह एक स्वतंत्र देश है।
हालांकि, कुछ चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की समुद्री नाकेबंदी अभी जारी रखी है। वहीं, ईरान के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी है कि अभी अंतिम समझौता नहीं हुआ है और अगर शर्तें पूरी नहीं हुईं तो सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिका अगले 24 से 48 घंटों में इस समझौते का पूरा टेक्स्ट जारी करेगा।