अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले किसी भी समझौते को लेकर सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान ने अपनी बात रखी है। इन चारों देशों ने साफ कहा है कि इस डील में खाड़ी देशों और पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जाए। उनका मानना है कि बिना सुरक्षा गारंटी के यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

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21 जून 2026 को काहिरा में इन चारों देशों के विदेश मंत्रियों की एक बड़ी मीटिंग हुई। इस बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला अंतिम समझौता GCC देशों और लेवेंट क्षेत्र सहित सभी अरब देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

समझौते की शर्तें और मांगें

इन देशों ने मांग की है कि भविष्य के किसी भी समझौते में कुछ बातों का खास ध्यान रखा जाए:

  • पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंधों के नियमों का पालन हो।
  • समुद्री रास्तों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सुरक्षित रहे।
  • सभी विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाए।
  • हर देश की संप्रभुता और उसकी सीमाओं का सम्मान किया जाए।

इस्लामाबाद MoU और पाकिस्तान की भूमिका

इन देशों ने 18 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच हुए “इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन” (Islamabad MoU) का स्वागत किया है। इसे तनाव कम करने की दिशा में एक अच्छा कदम माना जा रहा है। इस पूरे समझौते को करवाने में पाकिस्तान ने बहुत अहम भूमिका निभाई, जिसकी तारीफ की गई। साथ ही कतर ने भी मध्यस्थ के तौर पर बड़ी मदद की।

इस MoU के बाद अब 60 दिनों तक बातचीत चलेगी ताकि एक स्थायी समाधान निकाला जा सके। 21 जून 2026 से स्विट्जरलैंड में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत शुरू हो गई है, जिसमें परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा हो रही है।

बड़ी चुनौतियां और चिंताएं

भले ही MoU का स्वागत हुआ है, लेकिन खाड़ी देशों के नेताओं और जानकारों में अभी भी डर है। जानकारों का कहना है कि यह डील ईरान की मिसाइलों, ड्रोन और उसके सहयोगी मिलिशिया नेटवर्क जैसी बड़ी सुरक्षा समस्याओं को हल नहीं कर पाएगी।

तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने चेतावनी दी कि इसराइल इस डील को खराब करने की कोशिश कर सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम जैसे तकनीकी मुद्दे अब भी नहीं सुलझे हैं, जिससे देरी हो सकती है।

इन्हीं वजहों से अब सऊदी अरब, UAE और कतर जैसे देश सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय नए सुरक्षा पार्टनर ढूंढ रहे हैं और अपनी रक्षा व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं।