अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर बहुत सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने साफ़ तौर पर चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई शुरू कर देगा और बम गिराना शुरू कर देगा। ट्रंप ने यह बात 17 जून 2026 को कही और साफ़ किया कि अभी यह समझौता पूरी तरह फाइनल नहीं हुआ है।

समझौते की मुख्य शर्तें और तारीखें

अमेरिका और ईरान के बीच 14 और 15 जून 2026 को एक शुरुआती समझौते (MoU) की घोषणा की गई थी। इस दस्तावेज़ पर 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड में आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर होंगे। जैसे ही इस पर साइन होंगे, दोनों देशों के पास पूरी डील को अंतिम रूप देने के लिए 60 दिनों का समय मिलेगा।

लीक हुई जानकारी के मुताबिक, इस 14 पॉइंट के समझौते में कुछ अहम बातें शामिल हैं:

  • लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान तुरंत और हमेशा के लिए बंद करना।
  • 30 दिनों के अंदर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलना।
  • ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को हटाना।
  • ईरान की तरफ से परमाणु हथियार न बनाने का वादा।
  • अमेरिका द्वारा ईरानी तेल की बिक्री पर छूट देना।

नेताओं के बयान और विवाद

राष्ट्रपति ट्रंप ने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर देगा। उन्होंने साफ़ कहा कि अमेरिका एक पैसा भी नहीं देगा। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने बताया कि ईरान की जमी हुई संपत्ति उसे तभी मिलेगी जब वह परमाणु हथियारों के भंडार को खत्म करने के ठोस कदम उठाएगा।

G7 देशों के नेताओं ने इस समझौते को एक बड़ा मौका बताया है, लेकिन उन्होंने लेबनान में युद्धविराम और हिज़्बुल्लाह के निशस्त्रीकरण की मांग की है। दूसरी ओर, ईरान ने इस डील को अपनी जीत माना है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी है कि अगर इसराइल ने लेबनान में हमले जारी रखे, तो उसका जवाब बहुत कड़ा होगा।

इस पूरे समझौते को करवाने में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और कतर ने मध्यस्थ के तौर पर बड़ी भूमिका निभाई है। हालांकि, वाशिंगटन में कुछ रिपब्लिकन सांसदों और इसराइल की तरफ से इस डील के नियमों को लेकर काफी विरोध देखा जा रहा है।