अमेरिका और ईरान के बीच एक बहुत बड़ा समझौता हुआ है जिसे ‘इस्लामाबाद समझौता’ कहा जा रहा है। इस डील में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। इस फैसले से दुनिया भर में शांति की उम्मीद जगी है और कई सैन्य ऑपरेशन बंद होंगे।

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इस समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने इलेक्ट्रॉनिक तरीके से हस्ताक्षर किए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने भी बतौर मध्यस्थ इस पर साइन किए। यह समझौता 18 जून 2026 से लागू हो गया है। अब 19 जून को स्विट्जरलैंड में इसका एक औपचारिक समारोह होगा, जिसमें पाकिस्तान और कतर की मदद रहेगी।

इस डील के तहत ईरान तुरंत Strait of Hormuz (हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य) को फिर से खोलेगा। वहीं अमेरिका ईरान के बंदरगाहों पर लगी अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत हटाएगा। आने वाले 30 दिनों के भीतर अमेरिका अपनी पूरी नाकेबंदी खत्म कर देगा और ईरान के आसपास से अपनी सेना हटा लेगा।

दोनों देशों ने तय किया है कि लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान पूरी तरह बंद कर दिए जाएंगे। ईरान अपने यूरेनियम के भंडार को कम करेगा और अमेरिका ईरान पर लगे कुछ कड़े प्रतिबंधों में ढील देगा। दोनों देशों ने एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करने और अंदरूनी मामलों में दखल न देने का वादा किया है। 60 दिनों के भीतर एक पूरी शांति संधि तैयार करने का रोडमैप भी बनाया गया है।

इस पूरी प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र ने भी मदद की है। अमेरिकी टीम में JD Vance और Jared Kushner जैसे लोग शामिल थे, जबकि ईरान की तरफ से Mohammad Bagher Ghalibaf और विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने बातचीत की। पाकिस्तान के राष्ट्रपति Asif Ali Zardari ने इसे एक ऐतिहासिक पल बताया है और सूचना मंत्री Attaullah Tarar ने कहा कि अब शांति बनी है।

हालांकि, इस समझौते के बावजूद लेबनान में इजराइली हमले की खबरें आई हैं जिनमें कुछ लोगों की जान गई है। अमेरिका के कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने इस समझौते की आलोचना की है और इसे सुरक्षा के लिए जोखिम बताया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी साफ किया है कि ईरान के फ्रीज किए गए फंड वापस मिलने चाहिए।