अमेरिका और ईरान ने लेबनान में युद्ध को रोकने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। दोनों देशों ने वहां एक ‘डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल’ बनाने पर सहमति जताई है। इस सेल के जरिए दोनों देश अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त करेंगे ताकि इलाके में तनाव को कम किया जा सके और सैन्य टकराव को रोका जा सके।
स्विट्जरलैंड में हुई बातचीत और समझौता
यह पूरा समझौता स्विट्जरलैंड में हुई बातचीत का नतीजा है, जिसमें कतर और पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। 22 जून 2026 को इस फैसले का ऐलान किया गया। यह समझौता 14 पॉइंट्स के एक बड़े मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का हिस्सा है, जिसका मकसद मिडिल ईस्ट में चल रही दुश्मनी को खत्म करना है। इस सेल का मुख्य काम यह देखना होगा कि लेबनान में सैन्य अभियान बंद हों और समझौते का पालन किया जाए।
ईरान और अमेरिका का पक्ष
ईरान के संसद स्पीकर और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने इस सेल के बनने को लेबनान युद्ध को खत्म करने की दिशा में एक बड़ी प्रगति बताया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसे समझौतों की पहली असली परीक्षा कहा। हालांकि, 30 जून 2026 को ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बग़ाई ने साफ कर दिया कि फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी स्तर पर और बैठकें करने की कोई योजना नहीं है। अमेरिका की तरफ से इस बातचीत का नेतृत्व उपराष्ट्रपति JD Vance ने किया था।
लेबनान और इसराइल की स्थिति
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने इस प्रस्ताव पर शुरुआती समर्थन जताया है। उन्होंने कहा कि अगर इस सेल से स्थायी युद्धविराम होता है और इसराइल की सेना लेबनान की जमीन से वापस जाती है, तो यह एक अच्छा कदम होगा।
- इसराइल की भूमिका: इस समझौते में इसराइल को शामिल नहीं किया गया है।
- नेतन्याहू का बयान: इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि उन्हें अपनी सैन्य कार्रवाई करने की पूरी आजादी है और उनकी सेना दक्षिणी लेबनान में तैनात रहेगी।
- इसराइल की चिंता: इसराइल का मानना है कि अमेरिका और ईरान की इस डील से हिजबुल्लाह और मजबूत हो सकता है और इलाके में ईरान का प्रभाव बढ़ेगा।
