अमेरिका और ईरान के बीच एक बड़ा समझौता हुआ है जिससे दुनिया भर में शांति की उम्मीद जगी है। दोनों देशों ने एक समझौते (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके तहत अब सैन्य हमले बंद होंगे और समुद्र में लगी नाकाबंदी हटाई जाएगी। यह खबर उन लोगों के लिए राहत भरी है जो खाड़ी देशों में रहते हैं या वहां व्यापार करते हैं।

🚨: US Iran Deal: अमेरिका और ईरान के बीच होने जा रहा है बड़ा समझौता, ट्रंप और पेज़ेशकियन करेंगे साइन

समझौते की बड़ी बातें

अमेरिका और ईरान ने 14 जून 2026 को डिजिटल तरीके से इस समझौते पर साइन किए। इसका आधिकारिक कार्यक्रम शुक्रवार, 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड के लुसर्न शहर में होगा। इस डील के तहत कुछ अहम फैसले लिए गए हैं:

  • सैन्य कार्रवाई बंद: लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य हमले तुरंत खत्म कर दिए जाएंगे।
  • नाकाबंदी खत्म: अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लगाई गई समुद्री नाकाबंदी को पूरी तरह हटाने का फैसला किया है।
  • समुद्र का रास्ता: ईरान ने वादा किया है कि Strait of Hormuz में व्यापारिक जहाजों को बिना किसी रुकावट के आने-जाने दिया जाएगा। पहले 60 दिनों तक कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।
  • परमाणु नियम: ईरान अब परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और इसके परमाणु कार्यक्रम की निगरानी IAEA एजेंसी करेगी।
  • तेल निर्यात: अमेरिका का ट्रेजरी विभाग ईरान के कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए छूट जारी करेगा।

पैसों और फौज का क्या होगा

समझौते के मुताबिक, अगले 60 दिनों तक परमाणु मुद्दों और प्रतिबंधों को हटाने के लिए बातचीत होगी। अगर दोनों देश अंतिम समझौते पर पहुँच जाते हैं, तो अमेरिका अपनी सेना को ईरान के पास से हटा लेगा। साथ ही, अमेरिका ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर के विकास फंड की मदद भी देगा।

इन देशों ने कराई बातचीत

इस बड़े समझौते को सफल बनाने में पाकिस्तान ने मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इसके अलावा कतर, सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और ओमान ने भी इस बातचीत में मदद की। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस कदम से क्षेत्र में सुरक्षा आएगी और समुद्र का रास्ता खुलेगा।

अभी भी बना हुआ है तनाव

समझौते के ऐलान के बावजूद कुछ जगह हालात सामान्य नहीं हैं। खबरों के अनुसार, ईरान के IRGC ने अभी भी कुछ जहाजों पर ड्रोन हमले किए हैं जिन्हें अमेरिकी सेना ने रोका। लेबनान में हिजबुल्लाह और इसराइल के बीच भी झड़पें जारी हैं। इसराइल के रक्षा अधिकारियों को डर है कि ईरान इस 60 दिन के समय का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए कर सकता है।