अमेरिका और ईरान ने हाल ही में एक डिजिटल समझौते (MoU) पर साइन किए हैं ताकि युद्ध को रोका जा सके। हालांकि, इस खबर के बीच तेहरान यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर Elham Kadkhodaee ने सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अभी इस डील को लेकर बहुत ज्यादा उम्मीदें पालना जल्दबाजी होगी।

प्रोफेसर Kadkhodaee ने साफ किया कि यह कोई पूरी शांति संधि नहीं है, बल्कि सिर्फ एक अस्थायी व्यवस्था है। इसका मकसद फिलहाल युद्धविराम को बढ़ाना है ताकि आने वाले समय में बड़ी बातचीत के लिए जगह बन सके। उन्होंने बताया कि ईरानी लोग अलग-अलग स्थितियों के लिए तैयार हैं और इस समझौते को लेकर काफी सतर्क हैं।

इस समझौते पर औपचारिक तौर पर 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड के Burgenstock में साइन किए जाएंगे। इस MoU के जरिए 60 दिनों की बातचीत की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर फोकस किया जाएगा।

समझौते में क्या बातें शामिल हैं

  • सभी मोर्चों पर, खासकर लेबनान में युद्ध को तुरंत और स्थायी रूप से रोकना।
  • Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही को फिर से शुरू करना और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाना।
  • अमेरिका द्वारा ईरान के आर्थिक सुधार के लिए एक योजना बनाना, जिसमें कम से कम 300 अरब डॉलर की फंडिंग का वादा किया गया है।
  • परमाणु सत्यापन के उपायों और क्षेत्रीय सुरक्षा के बदले प्रतिबंधों में ढील देना।

हालांकि, इस डील को लेकर अमेरिका और ईरान के दावों में अंतर है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने पर सहमति जताई है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण है। वहीं, Strait of Hormuz में टोल टैक्स वसूलने को लेकर भी दोनों पक्षों की बातों में टकराव दिख रहा है।

इस बीच, लेबनान के बेरूत में इसराइल के हमले ने तनाव बढ़ा दिया है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव Mohammad Bagher Zolghadr ने चेतावनी दी कि ऐसी लाल रेखाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राष्ट्रपति Trump ने भी इसराइल के इस हमले की आलोचना की है।