अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद अब लेबनान की बारी है। लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने साफ कहा है कि वे इजरायली सेना की पूरी तरह वापसी और कैदियों की रिहाई के लिए अपनी कोशिशें तेज करेंगे। इस डील से उम्मीद है कि इलाके में लंबे समय से चल रही जंग, तबाही और लोगों के विस्थापन का अंत होगा और आम जनता को राहत मिलेगी।

अमेरिका और ईरान के बीच क्या हुआ समझौता

अमेरिका और ईरान ने एक ‘पीस डील’ की है जिससे 107 दिनों से चल रही जंग को रोकने की कोशिश की गई है। इस समझौते के तहत तुरंत और स्थायी युद्धविराम (ceasefire) लागू होगा। साथ ही 19 जून 2026 तक Strait of Hormuz को फिर से खोलने का फैसला लिया गया है। ईरान ने यह साफ किया है कि इस समझौते का असर लेबनान समेत सभी मोर्चों पर होगा और वहां भी लड़ाई रुकेगी।

लेबनान की मांग और कोशिशें

प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने कहा कि वे वाशिंगटन में चल रही बातचीत के जरिए अपनी मांगों को आगे बढ़ाएंगे। उनका मुख्य लक्ष्य इजरायली सेना को लेबनान की जमीन से पूरी तरह बाहर निकालना और वहां बंद कैदियों को छुड़ाना है। उनका मानना है कि इस शांति समझौते से लेबनान की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी पुरानी मांगों को पूरा करने का अच्छा मौका मिला है।

इजराइल का कड़ा रुख

जहां लेबनान सेना की वापसी चाहता है, वहीं इजराइल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने इसे मानने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि इजरायली सेना दक्षिण लेबनान, सीरिया और गाजा से पीछे नहीं हटेगी। इजराइल ने दक्षिण लेबनान में एक ‘सुरक्षा क्षेत्र’ बनाने की बात कही है जिसे ‘येलो लाइन’ कहा जा रहा है। लेबनान के संस्कृति मंत्री घसान सलामे ने इस ‘येलो लाइन’ को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया है।

अन्य संस्थाओं का क्या कहना है

  • Hezbollah: संगठन ने बताया कि अमेरिका-ईरान डील के बाद उन्होंने हमले बंद कर दिए हैं। उन्होंने लेबनान के मुद्दे को डील में शामिल करने के लिए ईरान का शुक्रिया अदा किया है।
  • संयुक्त राष्ट्र (UN): महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस शांति समझौते की तारीफ की और इसे विवाद सुलझाने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है।

फिलहाल दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इजराइल वास्तव में लेबनान से अपनी सेना वापस करेगा या तनाव बरकरार रहेगा।