अमेरिका और ईरान के बीच शांति बहाली के लिए पाकिस्तान में हुई बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चले इस मैराथन सत्र के बाद भी दोनों देश किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए। इस्फहान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मोहसिन फरखानी ने दावा किया है कि अमेरिका इस बातचीत में गंभीर नहीं था और अपने लक्ष्यों को पूरा करने में नाकाम रहा।
बातचीत क्यों रही नाकाम और क्या थे मुख्य मुद्दे?
ईरान का अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास इस बातचीत की विफलता की सबसे बड़ी वजह रहा। दोनों देशों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई, जिसके कारण यह डिप्लोमैटिक कोशिश बेकार गई। मुख्य मुद्दे नीचे दिए गए हैं:
- होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने पर विवाद रहा।
- ईरान के यूरेनियम संवर्धन के अधिकारों को लेकर असहमति थी।
- ईरान में इस तनाव के दौरान इंटरनेट ब्लैकआउट रिकॉर्ड 44 दिनों तक पहुंच गया।
इस मामले में बड़े नेताओं और विशेषज्ञों ने क्या कहा?
इस बातचीत के नतीजों पर अलग-अलग पक्षों ने अपनी राय रखी है। जहां प्रोफेसर फरखानी ने अमेरिका की कमजोरी बताई, वहीं अमेरिकी पक्ष ने इसे ईरान का नुकसान करार दिया।
| नाम/पद | बयान |
|---|---|
| मोहसिन फरखानी (प्रोफेसर) | अमेरिका ने पाकिस्तान से मध्यस्थता के लिए मिन्नतें कीं, लेकिन उनकी टीम गंभीर नहीं थी। |
| JD Vance (अमेरिकी उपराष्ट्रपति) | मैंने अपना सबसे अच्छा और आखिरी प्रस्ताव दिया था, समझौता न होना ईरान के लिए बुरी खबर है। |
| इशाक डार (पाकिस्तानी विदेश मंत्री) | दोनों देश युद्धविराम का पालन करें, पाकिस्तान बातचीत कराने की कोशिश जारी रखेगा। |
| जवाद ज़रीफ़ (पूर्व ईरानी विदेश मंत्री) | अमेरिका ईरान पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकता, किसी भी हल के लिए आपसी सम्मान जरूरी है। |
| एस्माइल बाक़ई (ईरानी प्रवक्ता) | कुछ बातों पर सहमति बनी थी, लेकिन 2-3 अहम मुद्दों पर मतभेद बने रहे। |
