अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली तकनीकी बातचीत से दुनिया में शांति और तरक्की की नई उम्मीद जगी है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक बड़ा कदम बताया है. यह पूरी प्रक्रिया ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MOU) के बाद शुरू हुई है.
क्या है इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग
अमेरिका और ईरान ने 18 जून 2026 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसका मुख्य मकसद सैन्य अभियानों को रोकना और Strait of Hormuz में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना है. इस समझौते से युद्ध खत्म हुआ है और लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्धविराम को आगे बढ़ाया गया है. इसके तहत ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने की बात कही है और अंतरराष्ट्रीय निगरानी की अनुमति दी है. इस समझौते के बाद 60 दिनों के भीतर एक विस्तृत अंतिम समझौता करने का लक्ष्य रखा गया है.
स्विट्जरलैंड में हुई अहम बैठकें
MOU के बाद 21 और 23 जून 2026 को स्विट्जरलैंड के Burgenstock और Geneva में तकनीकी बातचीत हुई. इन चर्चाओं को सफल बनाने में पाकिस्तान और कतर ने बड़ी भूमिका निभाई. इस बातचीत के बाद चार वर्किंग ग्रुप बनाने पर सहमति बनी है. ये ग्रुप प्रतिबंधों को खत्म करने, परमाणु मामलों, आर्थिक विकास और निगरानी पर काम करेंगे. अमेरिका और ईरान ने Strait of Hormuz में किसी भी गलतफहमी को रोकने के लिए सीधे बातचीत का रास्ता खोलने का भी फैसला किया है.
मिसाइल प्रोग्राम पर सफाई
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने साफ किया कि अमेरिका और ईरान के बीच हुई बातचीत में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर कोई चर्चा नहीं हुई और यह MOU का हिस्सा नहीं था. ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने भी अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान कहा कि उनके मिसाइल प्रोग्राम पर कोई समझौता नहीं होगा. अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance ने इस संभावित समझौते में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया है.
शांति की कोशिशें और चेतावनी
पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar ने बताया कि कतर के साथ मिलकर किए गए राजनयिक प्रयासों से ही वॉशिंगटन और तेहरान को बातचीत की मेज पर लाया गया. प्रधानमंत्री शरीफ ने उन ‘विघटनकारी दलों’ को चेतावनी दी है जो इस शांति प्रक्रिया और आपसी समझ को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने इस पूरी बातचीत को एक ऐतिहासिक सफलता बताया है.
