अमेरिका और सऊदी अरब ने 22 जुलाई 2026 को एक बड़े नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह दशकों तक चलने वाला गठबंधन है जो अरबों डॉलर का निवेश लाएगा। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य सऊदी अरब की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग करना है।
समझौते की मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा समर्थित इस सौदे का मकसद सऊदी अरब में नागरिक परमाणु कार्यक्रम को बढ़ावा देना है, जिसका इस्तेमाल सैन्य कार्यों में नहीं होगा। इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की संभावना पर भी बात की गई है, जिस पर दो साल का संयुक्त अध्ययन किया जाएगा। इस काम की निगरानी अमेरिकी कंपनियां करेंगी और तकनीक सऊदी अरब के साथ साझा नहीं की जाएगी।
यह समझौता 30 वर्षों तक प्रभावी रहेगा। इसमें परमाणु संयंत्रों के निर्माण के लिए अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि अमेरिका का प्रभाव बना रहे और सऊदी अरब को रूस या चीन की तकनीक पर निर्भर न रहना पड़े।
विवाद और चिंताएं
सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कुछ सख्त नियमों में छूट दी गई है, जिसकी कई विशेषज्ञों ने आलोचना की है। भू-राजनीतिक विश्लेषक Michael Horowitz ने चिंता जताई है कि यह समझौता पूरी तरह से परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने में सक्षम नहीं हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी ऊर्जा सचिव Chris Wright ने कहा है कि यह समझौता परमाणु सुरक्षा के उच्चतम मानकों का पालन करेगा और दोनों देशों के लोगों के लिए फायदेमंद साबित होगा। अभी राष्ट्रपति इस सौदे को मंजूरी के लिए अमेरिकी संसद (Congress) में पेश करेंगे।
