अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले किए हैं। यह कार्रवाई ओमान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य में तीन मालवाहक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई। ट्रंप सरकार ने इस पूरे ऑपरेशन में इसराइल को सीधे तौर पर शामिल न रखने का फैसला किया, हालांकि इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस ऑपरेशन का हिस्सा बनना चाहते थे।
ईरान के कई ठिकानों को बनाया निशाना
8 जुलाई 2026 को अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई शुरू की। इस बार के हमले पिछले हमलों के मुकाबले आठ गुना ज़्यादा बड़े थे। अमेरिका ने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, तटीय निगरानी प्रणालियों, जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और ड्रोन लॉन्च साइट्स को तबाह कर दिया। इसके साथ ही ईरान के बंदरगाहों पर भी हमले किए गए।
राष्ट्रपति ट्रंप और ईरान की प्रतिक्रिया
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की हरकतों को खतरनाक और युद्धविराम का उल्लंघन बताया। उन्होंने सख्त चेतावनी दी कि अगर ईरान ने तेल की सप्लाई रोकने की कोशिश की, तो अमेरिका इस सैन्य कार्रवाई को पूरा करने के लिए मजबूर होगा। दूसरी तरफ, ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश की सुरक्षा और सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और उन्हें आत्मरक्षा का पूरा हक है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उन्होंने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सेना के ठिकानों पर हमला किया है।
अमेरिका, इसराइल और लेबनान के बीच नया समझौता
हमलों के बीच 6 जुलाई 2026 को एक बड़ी खबर आई, जिसमें अमेरिका, इसराइल और लेबनान ने एक त्रिपक्षीय ढांचे (Trilateral Framework) की घोषणा की। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बताया कि इस समझौते का मकसद लेबनान की संप्रभुता को वापस लाना, हिजबुल्लाह को निशस्त्र करना और उसके आतंकी ढांचे को खत्म करना है। इसराइल के रक्षा मंत्री ने भी साफ किया कि अमेरिका ने इसराइल को लेबनान से हटने के लिए नहीं कहा है। हालांकि, दोनों तरफ से हो रहे नए हमलों ने पिछले महीने हुए अंतरिम समझौते को खतरे में डाल दिया है।
