अमेरिका सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, फ़िलिस्तीनी संगठनों पर $655.5 मिलियन का मुआवज़ा बरकरार.

Nura Basta11 August 20263 min read58 viewsWorld
अमेरिका सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, फ़िलिस्तीनी संगठनों पर $655.5 मिलियन का मुआवज़ा बरकरार.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाते हुए फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी यानी PA और फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन यानी PLO की उस अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने $655.5 मिलियन यानी भारतीय रुपयों के हिसाब से लगभग 6,244.77 करोड़ रुपये के भारी-भरकम मुआवज़े के आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी। यह पूरा मामला 2000 के दशक के दौरान इज़राइल में हुए उन खौफनाक आतंकवादी हमलों से जुड़ा हुआ है, जिनमें कई अमेरिकी नागरिकों की जान चली गई थी और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अमेरिकी न्यायपालिका के इस सख्त रुख से पीड़ित परिवारों को बड़ी राहत मिली है, जबकि दूसरी तरफ फ़िलिस्तीनी प्रशासन के सामने एक नई और गंभीर आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई है। रूस के अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्थान रशिया टुडे (RT) की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस सोनिया सोटोमायोर ने इस अपील पर बिना किसी तरह की अतिरिक्त टिप्पणी किए इसे सीधे तौर पर खारिज कर दिया, जिसके बाद निचली अदालत की तरफ से सुनाया गया मुआवज़े का यह फैसला अब पूरी तरह से लागू और प्रभावी बना हुआ है।

मुआवज़े की भारी रकम से फ़िलिस्तीनी अर्थव्यवस्था पर मंडराया बड़ा खतरा

फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी और पीएलओ ने अदालत में अपनी अपील दाखिल करते हुए साफ तौर पर दलील दी थी कि इतनी बड़ी और भारी-भरकम राशि का भुगतान करने से उनकी पूरी अर्थव्यवस्था बहुत ही गंभीर संकट के दौर में चली जाएगी। उनका कहना था कि इस फैसले के बाद क्षेत्र में बेरोज़गारी का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा और स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा व्यवस्था, न्याय प्रणाली तथा आम जनता की सुरक्षा जैसी बुनियादी और आवश्यक सेवाएं भी इसकी वजह से बुरी तरह प्रभावित होंगी। इसके अलावा, उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि इस वित्तीय दबाव के कारण वेस्ट बैंक के इलाकों में अस्थिरता और हिंसा की स्थिति का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। यह पूरा कानूनी विवाद उन अमेरिकी परिवारों की तरफ से दायर किए गए मुकदमों के इर्द-गिर्द घूमता है, जिनके अपने परिजन साल 2002 से 2004 के बीच चले दूसरे इंतिफादा आंदोलन के दौरान इज़राइल में हुए कुल छह अलग-अलग आतंकवादी हमलों में मारे गए थे या फिर अपनी जान बचाते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस मामले में साल 2016 के दौरान एक संघीय अपील अदालत ने कानूनी अधिकार क्षेत्र के तकनीकी आधार पर पुराने फैसले को पलट दिया था, लेकिन साल 2019 में अमेरिकी कांग्रेस की तरफ से एक नया कानून पारित किया गया, जिसके बाद इस पूरे मामले को दोबारा से शुरू किया गया। इस नए कानून ने विदेशों की धरती पर हुए आतंकवादी हमलों का शिकार बने अमेरिकी नागरिकों को मुआवजे की मांग के लिए सीधे तौर पर अदालत में मुकदमा दायर करने का कानूनी अधिकार दे दिया था और पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने इस विशेष कानून की संवैधानिक वैधता को भी पूरी तरह से सही ठहराया था।

वेस्ट बैंक की पहले से ही खराब वित्तीय स्थिति और टैक्स विवाद

मौजूदा हालात को देखा जाए तो वेस्ट बैंक का इलाका पहले से ही बहुत ही गंभीर और गहरे वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है, क्योंकि इज़राइल सरकार ने फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी की तरफ से अलग-अलग माध्यमों से एकत्र किए गए टैक्स राजस्व यानी टैक्स के पैसों का एक बहुत बड़ा हिस्सा रोककर अपने पास रखा हुआ है। इज़राइल का यह आरोप है कि इस तरह के धन का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने और उसे वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है, जबकि दूसरी तरफ फ़िलिस्तीनी प्रशासन इस पूरी कार्रवाई को एक सोची-समझी वित्तीय घेराबंदी करार देता है। दुनिया भर के तमाम कानूनी और राजनीतिक विशेषज्ञों का इस मामले में यही मानना है कि अगर इस मुआवज़े की पूरी राशि की सख्ती से वसूली की जाती है, तो फ़िलिस्तीनी प्रशासन के ऊपर आर्थिक बोझ कई गुना और अधिक बढ़ जाएगा। फिलहाल इस बड़े फैसले के बाद से दोनों ही पक्षों के बीच कानूनी दांव-पेच और राजनीतिक बयानबाजी का दौर आगे भी जारी रहने की पूरी संभावना बनी हुई है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय बिछात के तमाम बड़े जानकारों की पैनी नजर टिकी हुई है।

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