ईरान और अमेरिका के बीच सालों से चली आ रही तनातनी अब खत्म हो सकती है। पाकिस्तान की मदद से दोनों देशों के बीच एक शांति समझौते (MOU) पर सहमति बनी है। इस डील को डिजिटल तरीके से साइन किया जाना था, लेकिन अब इसे लेकर दोनों तरफ से अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं।
पाकिस्तान का दावा और अमेरिका की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने बताया कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते का फाइनल ड्राफ्ट तैयार हो गया है। उन्होंने कहा कि 14 जून को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इस पर हस्ताक्षर होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इस खबर को सोशल मीडिया पर शेयर किया, लेकिन उन्होंने लीक हुए दस्तावेजों को गलत बताया और कहा कि असली शर्तें कुछ और हैं। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बताया कि ईरान के अधिकारी आमने-सामने मिलने के बजाय रिमोट साइनिंग यानी डिजिटल हस्ताक्षर को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
ईरान ने क्यों जताया संदेह
एक तरफ पाकिस्तान और अमेरिका की बातें थीं, तो दूसरी तरफ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने कहा कि रविवार (14 जून) को कोई साइनिंग नहीं होगी। उन्होंने इसकी वजह ‘दूसरे पक्ष की हिचकिचाहट’ बताई। ईरान के अधिकारियों का कहना है कि अभी वे समझौते के शब्दों की जांच कर रहे हैं। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने पहले कहा था कि डिजिटल सिग्नेचर के जरिए समझौता होगा और इसके बाद तकनीकी बातचीत शुरू होगी।
समझौते में क्या-क्या शामिल हो सकता है
इस MOU में कुछ ऐसी बातें शामिल हैं जिससे दुनिया भर के हालात बदल सकते हैं। इसमें मुख्य तौर पर ये बिंदु शामिल हैं:
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना।
- ईरान के बंदरगाहों से अमेरिकी नौसेना की घेराबंदी हटाना।
- ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनाने का वादा करना।
- धीरे-धीरे प्रतिबंध हटाना और ईरान की जमी हुई संपत्ति वापस करना।
- लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म करना और इजरायल का कब्जा वाले इलाकों से हटना।
- अगले 60 दिनों तक परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों को हटाने पर तकनीकी बातचीत करना।
इस डील को सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और कतर जैसे देश भी समर्थन दे रहे हैं। रूस और चीन के राजदूतों को भी इस मामले की जानकारी दे दी गई है।