अमेरिका में ट्रंप सरकार के खिलाफ एकजुट हुए 25 राज्य, टैरिफ नीति को लेकर कोर्ट में दी चुनौती

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई आर्थिक नीतियों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 25 राज्यों ने राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में एक बड़ा मुकदमा दायर किया है। यह कानूनी लड़ाई प्रशासन द्वारा लगाए गए नए टैरिफ यानी आयात शुल्क के खिलाफ है, जिसे राज्य सरकारों ने गैरकानूनी और आम जनता पर अनावश्यक बोझ बताया है।
टैरिफ विवाद की असली वजह
इस पूरे मामले की शुरुआत ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू की गई नई टैरिफ नीति से हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह तर्क रहा है कि ऊंचे टैरिफ लगाने से अमेरिकी विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फिर से मजबूती मिलेगी। उन्होंने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का हवाला देते हुए व्यापार घाटे को एक राष्ट्रीय आपातकाल बताया और दुनिया भर से आने वाले आयात पर टैक्स लगा दिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह साफ कर दिया था कि IEEPA का उपयोग टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया जा सकता है। इसके बाद भी ट्रंप प्रशासन ने पहले 10 फीसदी का वैश्विक टैरिफ लगाया था, जो 24 जुलाई को समाप्त हो गया। अब प्रशासन 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत नए टैरिफ लागू कर रहा है, जो 10 फीसदी से 12.5 फीसदी के बीच हैं। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो अमेरिका में 99 फीसदी आयात की आपूर्ति करते हैं।
आम आदमी पर पड़ेगा सीधा असर
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स ने कहा कि ट्रंप प्रशासन अवैध रूप से परिवारों और व्यवसायों पर कर बढ़ा रहा है। वहीं, कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा ने इस फैसले की तीखी आलोचना की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये टैरिफ वास्तव में टैक्स हैं और इनका भुगतान आखिरकार आम जनता को ही अपनी जेब से करना पड़ता है। रॉब बोंटा के अनुसार, आम लोग सरकार की इन विफल आर्थिक नीतियों का खर्च उठाने के लिए मजबूर नहीं किए जा सकते।
अमेरिकी न्यूज वेबसाइट पॉलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले महीने जुलाई में अमेरिका ने 59 देशों और यूरोपीय संघ पर दोहरे अंक का टैरिफ लगाया था। प्रशासन का कहना है कि यह कदम जबरन श्रम से बने उत्पादों पर कार्रवाई करने के लिए उठाया गया है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका अपने वैध अधिकारों का उपयोग कर रहा है और जबरन श्रम वाली वस्तुओं पर प्रतिबंध न लगाना अमेरिकी कारोबार के लिए नुकसानदायक है। अब देखना यह है कि कोर्ट इस कानूनी विवाद पर क्या फैसला सुनाता है।