West Asia Tension: तेल की सप्लाई में रुकावट से एशिया में बढ़ेगी सोलर एनर्जी, Jefferies की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की सप्लाई में आने वाली दिक्कतों ने दुनिया भर की चिंता बढ़ा दी है। खास तौर पर एशिया के उन देशों के लिए यह बड़ी चुनौती है जो तेल के लिए पूरी तरह बाहर पर निर्भर हैं। अब हालात यह हैं कि कई देश तेल के बजाय सोलर और विंड एनर्जी जैसे विकल्पों की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे हैं ताकि भविष्य में ऊर्जा संकट से बचा जा सके।
पश्चिम एशिया के तनाव का एशिया पर क्या असर होगा?
Jefferies की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव और Strait of Hormuz जैसे मुख्य रास्तों पर खतरा बढ़ गया है। इससे तेल की सप्लाई रुक सकती है, जिससे एशिया के देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रिन्यूएबल एनर्जी पर निर्भर होना पड़ेगा। बता दें कि लगभग 85% एनर्जी ट्रैफिक एशिया के लिए होता है, इसलिए यहाँ असर सबसे ज़्यादा होगा।
IMF ने भी बताया कि Strait of Hormuz के बंद होने से ग्लोबल ऑयल मार्केट में भारी गड़बड़ी हुई है। इस वजह से अब ऊर्जा सुरक्षा एक geopolitical necessity बन गई है और देश अब केवल पर्यावरण के लिए नहीं बल्कि अपनी ज़रूरत के लिए ग्रीन एनर्जी की ओर मुड़ रहे हैं।
देशों ने अपनी ऊर्जा रणनीति में क्या बदलाव किए हैं?
दक्षिण कोरिया ने अपनी ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव किया है और अब 100 GW रिन्यूएबल एनर्जी के लक्ष्य को 2030 से पहले पूरा करने का ऐलान किया है। वहाँ के राष्ट्रपति Lee Jae-myung ने इस स्थिति को एक आपातकाल बताया है। वहीं जापान के प्रधानमंत्री Sanae Takaichi ने तेल के अतिरिक्त भंडार जारी करने की योजना बनाई है।
बाजार के आंकड़ों पर नज़र डालें तो वैकल्पिक ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश पहले के मुकाबले काफी बढ़ गया है। नीचे दी गई टेबल में मुख्य डेटा दिया गया है:
| विवरण | जानकारी/डेटा |
|---|---|
| एशिया के लिए ऊर्जा ट्रैफिक | 85% |
| वैकल्पिक ऊर्जा निवेश में बढ़त | लगभग 35% |
| दक्षिण कोरिया का लक्ष्य | 100 GW (2030 से पहले) |
| मुख्य जोखिम क्षेत्र | Strait of Hormuz |
भारत और अन्य एशियाई देशों की क्या स्थिति है?
Jefferies की रिपोर्ट कहती है कि भारत की आर्थिक रफ़्तार फिलहाल ठीक है, लेकिन अगर Strait of Hormuz में रुकावटें जारी रहती हैं, तो भारत जैसे देशों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। कई देश फिलहाल शॉर्ट टर्म के लिए कोयले और न्यूक्लियर एनर्जी का सहारा ले रहे हैं ताकि तुरंत होने वाले सप्लाई शॉक को मैनेज किया जा सके।
Ember जैसी संस्थाओं का कहना है कि 2026 के इस संघर्ष ने सोलर एनर्जी की तरफ शिफ्ट होने की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है। अब देश volatile shipping routes पर निर्भरता कम करने के लिए अपने घरेलू ऊर्जा स्रोतों को मजबूत करने में जुटे हैं।