Yemen में बिगड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था, कैंसर पीड़ित महिला की कहानी से खुला सरकारी अस्पतालों का काला सच.

यमन के ताइज़ शहर के पास रहने वाली Jaleelah Abdul Hameed नाम की एक महिला इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हैं, जिनकी दुखद कहानी ने वहां के स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। 50 साल की उम्र में उन्हें लीवर कैंसर होने का पता चला, लेकिन शुरुआत में गलत इलाज के कारण उनकी स्थिति और भी गंभीर हो गई। घर की माली हालत खराब होने की वजह से वह विदेश जाकर अपना इलाज करवाने में असमर्थ थीं, जिसके कारण उन्होंने अपनी कीमोथेरेपी बंद कर दी और जड़ी-बूटियों पर भरोसा करना शुरू कर दिया।
स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल
Jaleelah Abdul Hameed ने करीब छह महीने तक शहद और पत्तियों का पेस्ट बनाकर खाया, लेकिन इससे उनकी तबीयत में सुधार होने के बजाय वह और अधिक कमजोर हो गईं। बाद में उन्हें बहुत ही नाजुक हालत में दोबारा अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जहां से उन्हें अब फिर से पारंपरिक चिकित्सा यानी कीमोथेरेपी पर लौटना पड़ा है। यह घटना 8 अगस्त 2026 को Al Jazeera English की एक रिपोर्ट में सामने आई, जिसने यमन की बदतर होती चिकित्सा सेवाओं की ओर सबका ध्यान खींचा है।
WHO की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
World Health Organization (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक, यमन में कम से कम 50% स्वास्थ्य केंद्र या तो बंद पड़े हैं या फिर काम करने की हालत में नहीं हैं। इस बर्बादी का असर देश के 20 मिलियन से अधिक लोगों पर पड़ रहा है, जिन्हें बुनियादी इलाज तक नसीब नहीं हो पा रहा है। इसी कारण WHO ने यमन को Grade 3 आपातकाल की श्रेणी में रखा है, जो कि सबसे ऊंचे स्तर का संकट माना जाता है। WHO रिपोर्ट के अनुसार, साल 2026 में फंड की कमी और सुरक्षा कारणों से स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कई बड़े संगठन उत्तर के इलाकों से पीछे हट चुके हैं।
क्या कहते हैं डॉक्टर
अस्पतालों में इलाज न मिल पाने की वजह से लोग अब झोलाछाप और बिना लाइसेंस वाली वैकल्पिक चिकित्सा लेने को मजबूर हैं। इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ Dr. Adel ने चेतावनी दी है कि बिना वैज्ञानिक आधार के जड़ी-बूटियों पर भरोसा करना मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। ताइज़ स्वास्थ्य कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि इन फर्जी दुकानों पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया है क्योंकि सरकारी ढांचे के अभाव में ऐसी शिकायतों को सीधे पुलिस या अभियोजन पक्ष के पास भेजा जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि UNICEF ने 2026 में 5.2 मिलियन लोगों की मदद के लिए 146.3 मिलियन डॉलर की अपील की है, जिसमें 3.5 मिलियन बच्चे शामिल हैं जो भूख और बीमारियों की मार झेल रहे हैं।