Saudi-Turkey-Pakistan रक्षा समझौते पर यमन का सख्त रुख, कहा- किसी भी सैन्य कार्रवाई का देंगे मुंहतोड़ जवाब

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए एक नए रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया में हलचल बढ़ा दी है। इस समझौते के सामने आते ही यमन ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है और चेतावनी दी है कि वे इस गठबंधन को अपनी सुरक्षा के लिए चुनौती मानते हैं। यमन के अधिकारियों ने साफ किया है कि यदि इस समझौते के नाम पर कोई भी देश यमन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई या घेराबंदी में शामिल होता है, तो उन्हें सीधा 'हमलावर' माना जाएगा।
समझौते का मुख्य उद्देश्य और यमन की चिंता
ईरान सरकार की समाचार सेवा प्रेस टीवी के अनुसार, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने पिछले शुक्रवार को संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का घोषित लक्ष्य संभावित हमलों के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा और आपसी सहयोग को मजबूत करना है। नियम के मुताबिक, यदि इन तीनों में से किसी भी एक देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, यमन की राजधानी सना में बैठी सरकार ने इसे एक खतरे के रूप में देखा है।
यमन की सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल के अध्यक्ष महदी अल-मशात ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस नए समझौते का इस्तेमाल यमन के खिलाफ जारी सैन्य अभियानों को जारी रखने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यमन अपनी 'घेराबंदी के बदले घेराबंदी' की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक कि उनके लक्ष्य पूरे नहीं हो जाते। उन्होंने सऊदी नेतृत्व से अपील की कि वे युद्ध का रास्ता छोड़कर राजनीतिक बातचीत और पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंधों की दिशा में आगे बढ़ें।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और क्या कहा गया
यमन के विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी कर इस गठबंधन पर सवाल उठाए हैं। मंत्रालय का मानना है कि ऐसे गठबंधन का उद्देश्य फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करने या इजरायल के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय किसी मुस्लिम देश पर दबाव बनाना है, जो चिंताजनक है। यमन का यह भी कहना है कि आर्थिक या राजनीतिक प्रभाव का उपयोग करके किसी देश के अधिकारों का उल्लंघन करना या अपराधों के लिए जवाबदेही से बचना संभव नहीं होगा।
वहीं, अंसारुल्लाह आंदोलन से जुड़े मोहम्मद अल-फराह ने भी अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों से आग्रह किया कि वे किसी भी मुस्लिम राष्ट्र के खिलाफ हो रही घेराबंदी या सैन्य कार्रवाई को 'राजनीतिक आड़' प्रदान न करें।
वर्षों पुराना संघर्ष और तनाव का माहौल
इन दोनों देशों के बीच तनाव नया नहीं है। इसकी शुरुआत 26 मार्च 2015 से हुई थी जब सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों ने यमन में सैन्य अभियान की शुरुआत की थी। इस संघर्ष में अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है और वहां एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया है। साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद से संघर्ष विराम की स्थिति बनी थी, लेकिन स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। इस नए रक्षा समझौते ने एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को बदल दिया है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।