यमन में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच जारी भू-राजनीतिक खींचतान अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। ताजा घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि यमन के जटिल शतरंज में शक्ति का संतुलन धीरे-धीरे रियाद (सऊदी अरब) के पक्ष में झुक रहा है, जबकि यूएई को रणनीतिक मोर्चे पर पीछे हटते हुए देखा जा रहा है। जमीन पर स्थिति यह है कि यूएई-समर्थित साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) अपना अस्तित्व बचाए रखने की कोशिश में है, वहीं सऊदी समर्थित ‘नेशनल शील्ड फोर्स’ ने रणनीतिक रूप से अहम इलाकों में अपनी पैठ बना ली है।
हद्रमौत और अल-महरा प्रांतों में एसटीसी की जिद के बीच सऊदी समर्थित फोर्स के लिए बना रास्ता
जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी हलचल सऊदी सीमा से लगे हद्रमौत और अल-महरा प्रांतों में देखने को मिली है। यूएई-समर्थित एसटीसी ने इन इलाकों से अपनी फौज हटाने से साफ इनकार कर दिया है, जबकि यमनी सरकार और सऊदी अरब दोनों ही चाहते थे कि ये इलाके खाली कर दिए जाएं। हालांकि, भारी दबाव के बाद एक बीच का रास्ता निकला है, जो सऊदी के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। एसटीसी ने यह स्वीकार कर लिया है कि इन इलाकों में रियाद-समर्थित सरकारी फोर्स “नेशनल शील्ड” की तैनाती की जाएगी, भले ही एसटीसी के लड़ाके भी वहां मौजूद रहें। ये क्षेत्र तेल संसाधनों से समृद्ध हैं और सऊदी बॉर्डर के साथ-साथ अहम सड़क मार्गों को कंट्रोल करते हैं, इसलिए यहाँ सऊदी समर्थित फोर्स की एंट्री एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।
सऊदी अरब का मास्टरस्ट्रोक: ‘नेशनल शील्ड’ के जरिए सीमा और मुख्य व्यापारिक रास्तों पर सीधा नियंत्रण
इस पूरे घटनाक्रम में ‘नेशनल शील्ड फोर्स’ (National Shield) की भूमिका सबसे अहम है। वर्ष 2022–23 के बाद तैयार की गई यह सऊदी-समर्थित नई सैन्य संरचना है, जिसे विशेष रूप से दक्षिण और पूर्वी यमन के स्ट्रैटेजिक इलाकों को अपने नियंत्रण में लेने के लिए बनाया गया है। इनकी तैनाती का दायरा अल-वदिआ बॉर्डर क्रॉसिंग, अल-अब्र कैंप, अल-गैदा एयरपोर्ट और निश्तून पोर्ट तक फैला हुआ है। इसका सीधा अर्थ है कि सऊदी सीमा और यमन के मुख्य व्यापारिक रास्तों की सुरक्षा अब सीधे तौर पर रियाद के वफादार बलों के हाथों में है। यमनी प्रेसिडेंशल लीडरशिप काउंसिल ने भी एक फैसले के तहत नेशनल शील्ड को कई महत्वपूर्ण सैन्य साइटों का चार्ज लेने का अधिकार दे दिया है, जिससे सऊदी द्वारा डिजाइन की गई इस सुरक्षा व्यवस्था को अब आधिकारिक और अंतरराष्ट्रीय वैधता भी मिल गई है।
अबू धाबी का घटता प्रभाव: यूएई समर्थित एसटीसी पर दबाव और सैनिकों की वापसी से कमजोर हुई पकड़
विश्लेषकों की नजर में यह यूएई के लिए एक बड़ा झटका है। अब तक दक्षिण यमन, खासकर अदन और कुछ पूर्वी प्रांतों में एसटीसी की मजबूत पकड़ अबू धाबी के लिए एक “इन्फ्लुएंस कार्ड” की तरह थी। लेकिन अब सऊदी अरब ने इन्हीं इलाकों में अपनी नेशनल शील्ड की ओपन तैनाती शुरू करके यूएई के प्रभाव को सीधे चुनौती दी है। तनाव तब और बढ़ गया जब सऊदी ने आरोप लगाया कि यूएई ने एसटीसी को सऊदी बॉर्डर के पास ऑपरेशन के लिए उकसाया है, जिसे रियाद ने अपनी “राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा” बताया। इस नैरेटिव के बाद सऊदी को सीधे दखल देने और एयरस्ट्राइक तक की चेतावनी देने का मौका मिल गया। लगातार बढ़ते सऊदी दबाव के बाद यूएई ने यमन से अपने बचे हुए सैनिकों को भी बाहर निकालने की घोषणा की है, जिससे जमीन पर उसका सीधा सैन्य प्रभाव कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
यमन के सुरक्षा ढांचे पर रियाद की मजबूत होती पकड़ और एसटीसी के लिए ‘को-एग्ज़िस्टेंस’ की मजबूरी
अब यमन के दक्षिण-पूर्व में बॉर्डर, पोर्ट और हाईवे-कॉरिडोर की सुरक्षा का आर्किटेक्चर सऊदी अरब के हाथों में केंद्रित हो रहा है। हद्रमौत और अल-महरा जैसे संसाधन-समृद्ध इलाकों में जहाँ पहले एसटीसी का “फुल कंट्रोल” होता था, वहां अब “को-एग्ज़िस्टेंस” (सह-अस्तित्व) का मॉडल बन गया है। इस नए मॉडल में अंतिम शक्ति-संतुलन सऊदी-समर्थित सरकारी ढांचे के पक्ष में ही जाता है। जहां सऊदी की प्राथमिकता एक “एकीकृत यमन” और अपनी दक्षिणी सीमा की अभेद्य सुरक्षा है, वहीं यूएई अलगाववादी गुटों और पोर्ट-कंट्रोल के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। वर्तमान परिदृश्य में, अबू धाबी अब रक्षात्मक मुद्रा में है, जबकि रियाद ने “नेशनल शील्ड” ब्रांड के जरिए यमन में एक नए सैन्य-राजनीतिक ऑर्डर की नींव रख दी है।




