सूडान की संप्रभु परिषद (Sovereign Council) के अध्यक्ष अब्देल फतह अल-बुरहान ने सऊदी अरब और सूडान के बीच सहयोग और रणनीतिक समन्वय के लिए उच्च परिषद (Higher Council) के पुनर्गठन का एक महत्वपूर्ण निर्णय जारी किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सूडान का गृहयुद्ध एक नए और खतरनाक मोड़ पर है। जहां एक तरफ सऊदी अरब अब खुलकर सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) के साथ खड़ा नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) का समर्थन करने के आरोप लग रहे हैं। अल-बुरहान का यह कदम रियाद के साथ संबंधों को औपचारिक और मजबूत बनाने की दिशा में उठाया गया है, जो इस क्षेत्र में बदलते समीकरणों का संकेत देता है।
सऊदी अरब का सूडानी सेना को खुला समर्थन
अनुसंधान से पता चलता है कि सऊदी अरब ने अपनी पुरानी तटस्थता की नीति को बदलते हुए अब अब्देल फतह अल-बुरहान और उनकी सेना (SAF) का समर्थन करने का फैसला किया है। हाल ही में अल-बुरहान की रियाद यात्रा के दौरान एक समन्वय परिषद (Coordination Council) की स्थापना की गई थी, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है। सऊदी अरब का मानना है कि सूडान में स्थिरता केवल एक मजबूत राज्य और सेना के माध्यम से ही आ सकती है, न कि मिलिशिया गुटों के जरिए। हाल ही में एक उच्च स्तरीय सऊदी प्रतिनिधिमंडल ने पोर्ट सूडान का दौरा किया था, जो पुनर्निर्माण और सहयोग पर केंद्रित था। यह समझौता सऊदी अरब की उस रणनीति का हिस्सा है जो ‘विखंडन’ के बजाय ‘राज्य की स्थिरता’ को प्राथमिकता देती है।
यमन के बाद अब सूडान में शक्ति प्रदर्शन
विशेषज्ञों का मानना है कि यमन के बाद अब सूडान सऊदी अरब और यूएई के बीच प्रतिद्वंद्विता का नया मैदान बन गया है। यमन में भी दोनों देशों के रास्ते अलग हो गए थे—सऊदी अरब ने वहां की सरकार (प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल) का समर्थन किया था, जबकि यूएई ने अलगाववादी समूहों (STC) का साथ दिया था। ठीक उसी तर्ज पर, सूडान में भी यह विभाजन साफ दिखाई दे रहा है। सऊदी अरब राष्ट्रीय सेना (SAF) के साथ खड़ा है, जबकि यूएई पर आरोप है कि वह गैर-सरकारी संगठन यानी RSF को समर्थन दे रहा है। यद्यपि यूएई ने यमन के बाद अपनी नीतियों में किसी औपचारिक पुनर्गठन की घोषणा नहीं की है, लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि दोनों खाड़ी देश अब एक-दूसरे के विपरीत खड़े हैं।
सऊदी और यूएई की रणनीतियों में अंतर
सूडान के संकट में दोनों देशों के दृष्टिकोण में भारी अंतर है। नीचे दी गई तालिका में सऊदी अरब और यूएई की भूमिकाओं और रणनीतियों की तुलना की गई है:
| विषय | सऊदी अरब का रुख | संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का रुख |
|---|---|---|
| समर्थन | सूडानी सशस्त्र बल (SAF) और अल-बुरहान | रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) और हेमेद्ती |
| रणनीति | राज्य और केंद्रीय सरकार को मजबूत करना | अपने प्रभाव वाले प्रॉक्सी गुटों (Proxies) का समर्थन |
| ताजा कदम | उच्च परिषद का पुनर्गठन और पोर्ट सूडान का दौरा | RSF को रसद और समर्थन देने के आरोप |
मिस्र के साथ मिलकर घेराबंदी की तैयारी
सऊदी अरब इस लड़ाई में अकेला नहीं है। 5 जनवरी 2026 को सऊदी अरब और मिस्र ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि सूडान पर उनके विचार “पूरी तरह समान” (Identical) हैं। दोनों देश मिलकर यूएई के प्रभाव को कम करने के लिए काम कर रहे हैं। इसमें उन अमीराती उड़ानों के लिए हवाई क्षेत्र (Airspace) को प्रतिबंधित करना शामिल है, जिन पर RSF को हथियार या रसद आपूर्ति करने का शक है। मिस्र और सऊदी अरब का यह संयुक्त प्रयास RSF की लॉजिस्टिक्स को घेरने और काटने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा, पाकिस्तान और सूडान के बीच एक रक्षा समझौता भी हुआ है, जिसमें सूडानी सेना को ड्रोन और विमान मिल सकते हैं, और माना जा रहा है कि इसमें सऊदी अरब की मध्यस्थता शामिल है।
आर्थिक और ओपेक (OPEC+) का तनाव
यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक कारण भी हैं। सऊदी अरब और यूएई के बीच तेल उत्पादन (OPEC+), समुद्री सीमाओं और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को लेकर पहले से ही तनाव चल रहा है। सूडान लाल सागर (Red Sea) के तट पर स्थित है, जो व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब नहीं चाहता कि उसके पड़ोस में यूएई समर्थित मिलिशिया का राज हो, जो भविष्य में उसकी सुरक्षा के लिए खतरा बन सके। अल-बुरहान द्वारा परिषद का पुनर्गठन करना इस बात का सबूत है कि सूडान ने अब अपना पाला चुन लिया है और वह रियाद के साथ अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहता है।
Last Updated: 18 January 2026




