सऊदी अरब के जेद्दा शहर में Middle East Green Initiative (MGI) की दूसरी मंत्री स्तरीय बैठक आयोजित की गई है। इस बैठक की अध्यक्षता सऊदी अरब के पर्यावरण, जल और कृषि मंत्री Abdulrahman Alfadley ने की। इस महत्वपूर्ण सत्र में 31 क्षेत्रीय सदस्य देशों के साथ यूनाइटेड किंगडम ने एक पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया। मीटिंग के दौरान पर्यावरण चुनौतियों से निपटने और हरियाली बढ़ाने के लिए वैश्विक प्रयासों को एकजुट करने पर जोर दिया गया है।
MGI बैठक में लिए गए मुख्य फैसले और नियुक्तियां
सऊदी मंत्री ने इस बैठक में चार नए सदस्य देशों—Ghana, Sierra Leone, Sri Lanka और Syria का स्वागत किया है। इन नए देशों के जुड़ने के बाद अब इस मुहिम के तहत पेड़ लगाने की कुल प्रतिबद्धता 22 अरब से अधिक हो गई है। बैठक में Eng. Ibrahim Alturki को आधिकारिक तौर पर Middle East Green Initiative का महासचिव नियुक्त करने की घोषणा भी की गई है। रियाद में एक स्थाई सचिवालय स्थापित करने की प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में है।
सऊदी अरब के पर्यावरण लक्ष्य और अब तक की प्रगति
सऊदी अरब अपनी National Environment Strategy के तहत तेजी से काम कर रहा है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक देश की 30 प्रतिशत भूमि को प्राकृतिक भंडार (Natural Reserves) के रूप में विकसित करना है। वर्तमान में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। Saudi Green Initiative (SGI) के माध्यम से अब तक 151 मिलियन से अधिक पेड़ लगाए जा चुके हैं और 40 मिलियन हेक्टेयर भूमि को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है।
| प्रमुख योजना | वर्तमान स्थिति/लक्ष्य |
|---|---|
| कुल पेड़ लगाने का लक्ष्य | 22 अरब से ज्यादा (क्षेत्रीय स्तर पर) |
| सऊदी में लगाए गए पेड़ | 151 मिलियन से अधिक |
| प्राकृतिक भंडार का लक्ष्य | 30% भूमि (2030 तक) |
| सचिवालय का स्थान | Riyadh (10 साल का खर्च सऊदी उठाएगा) |
| नए सदस्य देश | Ghana, Sierra Leone, Sri Lanka, Syria |
क्षेत्रीय सहयोग और भविष्य की रणनीति
सऊदी अरब ने पुष्टि की है कि वह अगले दस वर्षों के लिए रियाद में बनने वाले सचिवालय के सभी परिचालन खर्चों को वहन करेगा। बैठक में कचरा रिसाइक्लिंग, मौसम सेवाओं, जलवायु अध्ययन और वन्यजीव संरक्षण में सुधार लाने पर भी चर्चा हुई। सदस्य देशों ने पर्यावरण की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयासों को मजबूत करने वाले प्रस्तावों पर सहमति जताई है। यह पहल 2021 में रियाद में शुरू की गई थी ताकि मध्य पूर्व में जलवायु परिवर्तन के असर को कम किया जा सके।




