मध्य पूर्व युद्ध का असर, भारत का 300 करोड़ का मखाना कारोबार प्रभावित, बंदरगाहों पर फंसा 4 लाख टन बासमती चावल
मध्य-पूर्व एशिया में चल रहे युद्ध की वजह से भारत के मखाना और बासमती चावल के निर्यात पर बुरा असर पड़ा है. दुबई के रास्ते होने वाली सप्लाई रुकने से 300 करोड़ रुपये का मखाना कारोबार संकट में है. इसके साथ ही बासमती चावल के हजारों कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं जिससे निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. बिहार से निकलने वाला मखाना और उत्तर भारत का बासमती चावल अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक नहीं पहुँच पा रहा है.
मखाना और बासमती निर्यात पर क्या असर पड़ा है?
दुबई भारत के मखाना कारोबार के लिए एक बड़ा हब है जहाँ मखाने की पैकिंग बदलकर उसे अमेरिका और यूरोप भेजा जाता है. युद्ध के कारण यह पूरी सप्लाई चेन अब टूटने लगी है. बिहार जो देश के कुल मखाना उत्पादन का 85-90 प्रतिशत हिस्सा देता है वहां के व्यापारी इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. बासमती चावल की स्थिति भी चिंताजनक है क्योंकि भारत के कुल निर्यात का लगभग 70-75 प्रतिशत हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों में ही जाता है.
- बंदरगाहों पर संकट: गुजरात और मुंबई के बंदरगाहों पर लगभग 4 लाख टन बासमती चावल यानी करीब 16,000 कंटेनर अटके हुए हैं.
- पेमेंट का संकट: अकेले ईरान में भारतीय निर्यातकों के 1000 करोड़ रुपये से अधिक के भुगतान फंसे हुए हैं.
- कीमतों में गिरावट: घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ने से बासमती चावल की कीमतों में कमी आई है जिससे किसानों की आय कम हो गई है.
निर्यातकों की बढ़ती लागत और लॉजिस्टिक्स चुनौतियां
युद्ध की वजह से समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ गया है जिससे शिपिंग लागत में भारी उछाल आया है. पहले एक कंटेनर का किराया जो 500 से 1000 डॉलर के बीच रहता था वह अब बढ़कर 3000 डॉलर तक पहुंच गया है. इसके अलावा बीमा कंपनियों ने ‘वॉर रिस्क’ के नाम पर प्रीमियम बढ़ा दिया है जिससे प्रति कंटेनर लगभग 2 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण रास्तों पर बढ़ते खतरे ने जहाजों की उपलब्धता कम कर दी है.
| विवरण | प्रभावित डेटा |
|---|---|
| मखाना कारोबार नुकसान | 300 करोड़ रुपये |
| फंसा हुआ बासमती चावल | 4 लाख टन (16,000 कंटेनर) |
| शिपिंग लागत में वृद्धि | 500-1000 डॉलर से 3000 डॉलर तक |
| ईरान में फंसा भुगतान | 1000 करोड़ रुपये से अधिक |
| खुदरा कीमतों में वृद्धि (खाड़ी देश) | 20-25 प्रतिशत तक |
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने व्यापारियों को सलाह दी है कि वे खाड़ी देशों के लिए नए कॉन्ट्रैक्ट करते समय सावधानी बरतें और जोखिम कम करने के लिए एफओबी (FOB) शर्तों का उपयोग करें. निर्यातकों ने भारत सरकार से भी अपील की है कि बंदरगाहों पर फंसे माल पर अतिरिक्त शुल्क न लिया जाए और बढ़ी हुई लागत में राहत दी जाए.




