ईरान और इजरायल के बीच बढ़ा तनाव, UAE और Qatar में चल रही अमेरिकी यूनिवर्सिटीज को मिली चेतावनी
ईरान में दो बड़ी यूनिवर्सिटीज पर हुए हवाई हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी सरकार इन हमलों की निंदा नहीं करती है, तो मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी और इजरायली यूनिवर्सिटीज उनके निशाने पर होंगी। ईरान ने इन हमलों के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया है और जवाबी कार्रवाई की बात कही है।
ईरान की यूनिवर्सिटीज पर हुए हमलों में क्या नुकसान हुआ?
28 मार्च 2026 को तेहरान की Iran University of Science and Technology पर जोरदार हमला हुआ। इसके बाद 29 मार्च को इस्फहान की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी को भी निशाना बनाया गया। इन हमलों में यूनिवर्सिटी की इमारतों और रिसर्च सेंटर्स को काफी नुकसान पहुंचा है। इजरायली सेना ने दावा किया है कि इन जगहों का इस्तेमाल ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल बनाने के लिए किया जा रहा था। इस तनाव के बीच हुए मुख्य घटनाक्रम नीचे दिए गए हैं:
| तारीख | स्थान और घटना |
|---|---|
| 28 मार्च 2026 | तेहरान की यूनिवर्सिटी पर हमला, पास के इलाके में 5 लोगों की मौत |
| 29 मार्च 2026 | इस्फहान यूनिवर्सिटी पर दूसरा हमला, 4 कर्मचारी घायल हुए |
| 30 मार्च 2026 | IRGC ने अमेरिका को दोपहर 12 बजे तक का अल्टीमेटम दिया |
| इजरायल का पक्ष | 50 से ज्यादा विमानों ने हथियार बनाने वाली जगहों पर हमला किया |
खाड़ी देशों में रह रहे छात्रों और प्रवासियों पर क्या असर होगा?
ईरान की सेना ने साफ़ तौर पर कहा है कि कतर और यूएई में मौजूद अमेरिकी यूनिवर्सिटीज अब उनके लिए जायज टारगेट हो सकते हैं। इसमें कतर की Texas A&M University और यूएई की New York University जैसे बड़े संस्थानों का नाम लिया गया है। सुरक्षा को देखते हुए कुछ संस्थानों ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया है। वहां रहने वाले भारतीय प्रवासियों और छात्रों को सलाह दी गई है कि वे कैंपस और उसके आसपास के इलाकों से फिलहाल दूरी बनाकर रखें।
ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने कहा है कि ईरान पहले हमला नहीं करता है, लेकिन अगर उनके आर्थिक या बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया गया, तो वे चुप नहीं रहेंगे। वहीं संयुक्त राष्ट्र ने दोनों तरफ से हो रहे हमलों की निंदा की है और इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तनाव से खाड़ी देशों में रह रहे लोगों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।




