Israel New Law: इस्राइल ने पास किया नया कानून, अब सैन्य अदालत फिलिस्तीनियों को सुनाएगी फांसी की सजा
इस्राइल की संसद यानी Knesset ने सोमवार, 30 मार्च 2026 को एक बड़ा और विवादित कानून पास कर दिया है। इस नए कानून के तहत सैन्य अदालतों में घातक आतंकी गतिविधियों के दोषी पाए जाने वाले फिलिस्तीनियों को अब मौत की सजा दी जा सकेगी। यह फैसला 62 वोटों के समर्थन के साथ लिया गया है। इस कानून के पारित होते ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मानवाधिकार संगठनों ने अपनी गहरी चिंता जाहिर की है और इसे भेदभावपूर्ण बताया है।
इस नए कानून के मुख्य नियम और शर्तें क्या हैं?
इस कानून को लेकर इस्राइल के भीतर और बाहर काफी चर्चा हो रही है क्योंकि इसमें सजा को लेकर कई कड़े प्रावधान किए गए हैं। नीचे दी गई जानकारी से आप इसके मुख्य बिंदुओं को आसानी से समझ सकते हैं:
- सैन्य अदालतों में दोषी पाए गए लोगों को फांसी के जरिए मौत की सजा दी जाएगी।
- सजा सुनाने के लिए जजों के बीच पूर्ण सहमति की जरूरत नहीं होगी, साधारण बहुमत ही काफी होगा।
- सैन्य अदालत से मिली मौत की सजा के खिलाफ दोषी को अपील करने का कोई अधिकार नहीं होगा।
- सजा सुनाए जाने के 90 दिनों के भीतर फांसी की प्रक्रिया को पूरा करना अनिवार्य होगा।
- यह कानून खास तौर पर उन फिलिस्तीनियों पर लागू होगा जिनका केस सैन्य अदालतों में चलेगा।
- यह नियम इस्राइली नागरिकों या वहां के निवासियों पर लागू नहीं किया गया है।
दुनिया और मानवाधिकार संगठनों ने क्या कहा?
कानून पास होने के तुरंत बाद दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। कई देशों और संस्थाओं ने इस पर कानूनी सवाल खड़े किए हैं और सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।
| संस्था या पक्ष | उनकी आधिकारिक प्रतिक्रिया |
|---|---|
| UN मानवाधिकार प्रमुख | कहा कि यह कानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के बुनियादी नियमों के खिलाफ है। |
| Palestinian Authority | इसे एक खतरनाक कदम और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन बताया। |
| Germany, France, UK | इन देशों ने संयुक्त बयान जारी कर चिंता जताई और इसे रोकने की अपील की। |
| Adalah और ACRI | इन संगठनों ने इस कानून को इस्राइल के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। |
| Itamar Ben Gvir | इस्राइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री ने इसे न्याय की जीत और दुश्मनों के लिए सबक बताया। |
प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने इस बिल के पक्ष में मतदान किया है, हालांकि खबरों के अनुसार उन्होंने अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने के लिए इसमें कुछ बदलावों की कोशिश भी की थी। मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह कानून न्याय की दो अलग-अलग व्यवस्थाएं पैदा करता है। फिलहाल सबकी नजरें इस्राइल के सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां इस कानून की वैधता को चुनौती दी जा रही है।




