White House New Proposal: अमेरिका ने खाड़ी देशों से माँगा युद्ध का खर्च, राष्ट्रपति ट्रंप ने बनाया नया प्लान
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के नेतृत्व वाला व्हाइट हाउस मिडिल ईस्ट में चल रहे सैन्य अभियानों का आर्थिक बोझ अपने क्षेत्रीय सहयोगियों पर डालने की योजना बना रहा है। इस योजना का जिक्र हाल ही में प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने एक ब्रीफिंग के दौरान किया। ‘Operation Epic Fury’ की लागत 5 हफ्तों में 35 बिलियन डॉलर तक पहुँचने के बाद प्रशासन इसके लंबे समय तक चलने पर चिंता जता रहा है। अब व्हाइट हाउस इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या अमीर खाड़ी देशों को उन ऑपरेशनों के लिए पैसा देना चाहिए जो उनकी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी हैं।
युद्ध पर कितना पैसा खर्च कर रहा है अमेरिका?
Operation Epic Fury के शुरुआती दिनों से ही खर्चा बहुत तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिकी प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार इस युद्ध की लागत का विवरण कुछ इस प्रकार है:
| समय सीमा | अनुमानित खर्च |
|---|---|
| शुरुआती 100 घंटे | 3.7 बिलियन डॉलर |
| पहला हफ्ता | 11.3 बिलियन डॉलर |
| दैनिक औसत खर्च | 1 बिलियन डॉलर |
| कुल 5 हफ्ते | 35 बिलियन डॉलर |
यह लागत इतनी ज्यादा है कि पेंटागन को अब यूक्रेन के लिए रखे गए हथियारों को भी मिडिल ईस्ट में इस्तेमाल करने पर विचार करना पड़ रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने अब तक 9,000 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया है।
इस नए प्रस्ताव पर अधिकारियों का क्या कहना है?
प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति Trump इस बात में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं कि अरब देश इस सैन्य अभियान में वित्तीय योगदान दें। यह मॉडल 1990-1991 के खाड़ी युद्ध की याद दिलाता है जब क्षेत्रीय देशों ने गठबंधन सेना के खर्च में बड़ा हिस्सा दिया था। इसके साथ ही प्रशासन के अन्य प्रमुख बिंदुओं पर एक नजर डालें:
- Secretary of War Pete Hegseth ने कहा है कि मिशन का मुख्य लक्ष्य ईरान के मिसाइल सिस्टम और नेवी को खत्म करना है।
- पेंटागन मिडिल ईस्ट में 10,000 अतिरिक्त जमीनी सैनिकों को भेजने की योजना भी तैयार कर रहा है।
- ईरान के साथ पर्दे के पीछे बातचीत चल रही है जिसे अधिकारियों ने सकारात्मक बताया है।
- फिलहाल खाड़ी देशों से कोई औपचारिक मांग नहीं की गई है लेकिन यह प्रस्ताव गंभीर चर्चा में है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम राष्ट्रपति Trump की उस विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें वह सुरक्षा के बदले आर्थिक भागीदारी की उम्मीद रखते हैं। इस फैसले का असर आने वाले समय में अमेरिका और खाड़ी देशों के संबंधों पर साफ देखने को मिल सकता है।




