Allahabad High Court Verdict: शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अपराध नहीं, कोर्ट ने सुरक्षा का दिया आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो उसे किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखा जाना चाहिए। जजों ने कहा कि समाज की राय या नैतिकता के आधार पर कोर्ट नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने से पीछे नहीं हटेगा।
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कोर्ट ने इस मामले में क्या आदेश दिया?
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने याचिकाकर्ता Anamika और उनके साथी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया था कि महिला के परिवार वाले उनकी जान के दुश्मन बने हुए हैं और ऑनर किलिंग का खतरा है। कोर्ट ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट के नियमों का पालन करते हुए जोड़े की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाएं।
इस कानूनी फैसले से जुड़ी मुख्य जानकारियां
- केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 3799/2026 के तहत यह फैसला सुनाया गया है।
- कोर्ट की टिप्पणी: बेंच ने कहा कि सामाजिक सोच कानून से ऊपर नहीं हो सकती और पुलिस का काम वयस्कों की मर्जी का सम्मान करना है।
- सुप्रीम कोर्ट का हवाला: कोर्ट ने Shakti Vahini vs Union of India मामले का जिक्र किया, जिसमें जोड़ों की सुरक्षा के लिए पुलिस की जवाबदेही तय की गई है।
- अगली कार्रवाई: कोर्ट ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी।
पुराने नियमों और इस फैसले में क्या अंतर है?
यह फैसला दिसंबर 2025 में आए एक अन्य आदेश से थोड़ा अलग है जिसमें लिव-इन को पारिवारिक अधिकारों के खिलाफ बताया गया था। 25 मार्च 2026 को आए इस ताजा फैसले में कोर्ट ने विशेष रूप से आपराधिक मुकदमेबाजी पर ध्यान दिया है। कोर्ट ने माना कि जब दो वयस्क सहमति से साथ हैं, तो उन पर कोई केस दर्ज नहीं किया जा सकता। यह आदेश उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो सामाजिक डर की वजह से सुरक्षा की मांग कर रहे थे और भारत में अपने अधिकारों को लेकर चिंतित रहते हैं।




