राजधानी दिल्ली की ऐतिहासिक विरासत में चार चांद लगाते हुए मुगलकालीन बारापुला ब्रिज अब अपने पुराने और भव्य स्वरूप में लौट आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की कड़ी मेहनत और संरक्षण कार्य के बाद, यह 400 साल पुराना ढांचा न केवल मजबूत हुआ है, बल्कि अब यह दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों को टक्कर देने के लिए तैयार है। संरक्षण का काम पूरा होने के बाद अब इसे विशेष रोशनी से जगमगाने की तैयारी की जा रही है, जिससे यह ऐतिहासिक पुल रात के समय भी आकर्षण का मुख्य केंद्र बना रहेगा।
चार सौ साल पुरानी विरासत को सहेजने के लिए पत्थरों की मरम्मत और ढांचे की मजबूती का काम हुआ पूरा
इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने और इसे मूल स्वरूप में लाने के लिए व्यापक स्तर पर काम किया गया है। पुल पर समय की मार के कारण जो पत्थर क्षतिग्रस्त हो गए थे, उनकी मरम्मत की गई है और पूरे ढांचे को मजबूती प्रदान की गई है। इसके साथ ही, पुल की सफाई और सौंदर्यीकरण का काम भी पूरा कर लिया गया है। अब अगले चरण में इस पुल पर विशेष ‘फसाड लाइटिंग’ (Illumination) लगाई जाएगी। इस विशेष रोशनी व्यवस्था का मकसद रात के अंधेरे में पुल की वास्तुकला की बारीकियों को उभारना है, ताकि इसकी खूबसूरती और अधिक निखर सके।
पर्यटकों को इतिहास से रूबरू कराने के लिए परिसर में लगाए जाएंगे विशेष सूचना बोर्ड, मिलेगी वास्तुकला की जानकारी
सिर्फ सौंदर्यीकरण ही नहीं, बल्कि पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए भी खास इंतजाम किए जा रहे हैं। पुल परिसर में जगह-जगह सूचना बोर्ड (Information Boards) लगाए जाएंगे। इन बोर्डों के माध्यम से बारापुला पुल का इतिहास, इसके निर्माण का कालखंड, इसकी अनूठी वास्तुकला और इससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों को बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि यहां आने वाले लोग सिर्फ इमारत को देखें नहीं, बल्कि इसके ऐतिहासिक महत्व को भी गहराई से समझ सकें।
मुगल काल में 1617 से 1622 के बीच हुआ था निर्माण, 1916 में ही इसे घोषित कर दिया गया था राष्ट्रीय महत्व का स्मारक
इतिहासकारों के अनुसार, बारापुला पुल मुगलकालीन स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। इसका निर्माण 1617 से 1622 के बीच कराया गया था। अपने दौर में यह पुल दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों को जोड़ने वाला एक प्रमुख संपर्क मार्ग हुआ करता था। इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भी इसका महत्व कम नहीं हुआ और साल 1916 में ही इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया गया था। लंबे समय तक अतिक्रमण और देखरेख के अभाव के बावजूद, अब यह अपनी खोई हुई पहचान वापस पा चुका है।
नई रोशनी और सौंदर्यीकरण से हेरिटेज टूरिज्म को मिलेगा बड़ा बढ़ावा, दिल्ली की विरासत सूची में और मजबूत होगी पहचान
बारापुला के इस कायाकल्प से दिल्ली में हेरिटेज टूरिज्म को एक नई दिशा मिलने की उम्मीद है। रोशनी की व्यवस्था होने के बाद यह स्थान ‘नाइट टूरिज्म’ के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है। अधिकारियों का मानना है कि संरक्षण कार्य का उद्देश्य सिर्फ एक ढांचे को बचाना नहीं था, बल्कि ऐतिहासिक पहचान को फिर से जीवित करना था। सौंदर्यीकरण के बाद, यह स्थान न केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करेगा, बल्कि स्थानीय लोगों को भी अपनी विरासत से जुड़ने का एक शानदार अवसर प्रदान करेगा।





