Strait of Hormuz संकट से भारत में LPG सप्लाई पर खतरा, क्रूड से ज्यादा रिफाइंड तेल पर दिखेगा असर
Strait of Hormuz में जारी तनाव के कारण भारत में रसोई गैस (LPG) की सप्लाई पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है. PL Capital की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल के मुकाबले पेट्रोल, डीजल और LPG जैसे रिफाइंड प्रोडक्ट्स के बाज़ार पर इसका असर ज़्यादा खतरनाक होगा. भारत अपनी LPG ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से मंगाता है, जिससे आने वाले दिनों में घरेलू और कमर्शियल सप्लाई पर असर पड़ने की संभावना है.
भारत में LPG की किल्लत क्यों हो सकती है?
भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बाहरी देशों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. इस संकट की वजह से देश की एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर कुछ अहम चुनौतियां सामने आ रही हैं:
- भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत LPG आयात करता है और इसका 90 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते आता है.
- देश के पास फिलहाल केवल 20 दिनों का LPG स्टॉक मौजूद है, जो किसी भी बड़ी सप्लाई रुकावट के लिए कम माना जा रहा है.
- 18 मार्च 2026 तक की रिपोर्ट के मुताबिक, 22 भारतीय जहाजों पर करीब 3.2 लाख टन LPG और 2 लाख टन LNG समुद्र में फंसी हुई थी.
- मिडिल ईस्ट से आने वाले गैस के आयात में पहले ही गिरावट देखी गई है, जो मार्च के महीने में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है.
संकट से बचने के लिए सरकार ने क्या तैयारी की?
भारत सरकार इस स्थिति पर लगातार नज़र बनाए हुए है और आम लोगों तक गैस पहुंचाने के लिए कई बड़े कदम उठाए जा रहे हैं. रिफ़ाइनरियों को साफ़ निर्देश दिए गए हैं कि वे घरेलू इस्तेमाल वाली गैस का उत्पादन बढ़ाएं. इसके अलावा, अस्पतालों और स्कूलों जैसी ज़रूरी जगहों के लिए सप्लाई को प्राथमिकता दी जा रही है. सरकार ने पेट्रोकेमिकल सेक्टर को दी जाने वाली सप्लाई में कटौती कर उसे घरेलू सिलेंडर की ओर मोड़ दिया है.
| सुविधा | वर्तमान स्थिति |
|---|---|
| LPG आयात का रास्ता | 90% Strait of Hormuz से |
| गैस रिज़र्व क्षमता | लगभग 20 दिन |
| नया सप्लाई पार्टनर | अमेरिका (USA) |
| फंसे हुए नाविक | 611 (सभी सुरक्षित) |
भारतीय शिपिंग मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ईरान के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं ताकि भारतीय झंडे वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता मिल सके. सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए भारत अब अमेरिका से LPG मंगाने पर ज़्यादा ज़ोर दे रहा है. साल 2026 के लिए अमेरिकी कंपनियों के साथ 2.2 मिलियन मीट्रिक टन गैस का नया समझौता भी किया गया है ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता को कम किया जा सके.




