Israel New Law: इस्राइल की संसद ने पास किया नया कानून, अब फिलिस्तीनी कैदियों को दी जाएगी फांसी की सज़ा
इस्राइली संसद (Knesset) ने सोमवार शाम को एक बेहद विवादित कानून को मंजूरी दे दी है। इस नए कानून के तहत अब उन फिलिस्तीनी कैदियों को मौत की सज़ा दी जा सकेगी जिन्हें ‘आतंकवाद’ के आरोपों में दोषी पाया जाएगा। इस फैसले के बाद अरब संसद (Arab Parliament) और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस्राइल की कड़ी निंदा की है। यह कानून 62 वोट के समर्थन से पास हुआ है, जबकि 48 सदस्यों ने इसके विरोध में मतदान किया और एक सदस्य अनुपस्थित रहा।
इस नए कानून के मुख्य नियम और शर्तें क्या हैं?
इस कानून के लागू होने के बाद अदालती प्रक्रिया और सज़ा देने के तरीकों में बड़े बदलाव किए गए हैं। अब मौत की सज़ा सुनाने के लिए जजों की सर्वसम्मति की ज़रूरत नहीं होगी, बल्कि साधारण बहुमत से भी यह फैसला लिया जा सकेगा। यहाँ इस कानून की कुछ प्रमुख शर्तें दी गई हैं:
- सज़ा की पुष्टि होने के 90 दिनों के भीतर फांसी देना अनिवार्य होगा।
- दोषी को फांसी देने का काम इस्राइली जेल सेवा (Israeli Prison Service) द्वारा किया जाएगा।
- कैदियों के पास किसी भी तरह की माफ़ी (Pardon) मांगने का अधिकार नहीं होगा।
- वेस्ट बैंक में रहने वाले फिलिस्तीनियों के लिए सैन्य अदालतों में मौत की सज़ा ही प्राथमिक दंड होगा।
- सज़ा पाने वाले कैदियों को अलग सुविधाओं में रखा जाएगा और उनकी कानूनी सलाह केवल वीडियो लिंक के माध्यम से होगी।
दुनिया भर के देशों और संगठनों की क्या है प्रतिक्रिया?
इस कानून के पास होते ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया है। कई देशों ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है। नीचे दी गई टेबल में विभिन्न देशों और संगठनों की प्रतिक्रिया देखी जा सकती है:
| संस्था या देश | प्रतिक्रिया और बयान |
|---|---|
| Arab Parliament | कानून की कड़ी निंदा की और इसे अवैध बताया |
| Palestinian Presidency | इसे जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन और युद्ध अपराध कहा |
| European Nations | जर्मनी, फ्रांस और यूके ने इसे अमानवीय सज़ा बताया |
| UN Experts | चेतावनी दी कि यह कानून प्रताड़ना के समान है |
| Human Rights Watch | इसे भेदभावपूर्ण और न्याय व्यवस्था के खिलाफ बताया |
इस्राइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री Itamar Ben-Gvir ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे ‘ऐतिहासिक दिन’ बताया है। दूसरी तरफ, मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका तर्क है कि यह कानून जातीय और नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा देता है और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इस्राइली अधिकारियों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है।




