Saudi Arabia और UAE उठा सकते हैं बड़ा कदम, ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने की खबर आई सामने
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध में सीधे तौर पर शामिल होने के करीब पहुंच गए हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी देश अब ईरान की तरफ से होने वाले लगातार हमलों को लेकर अपनी रणनीति बदल रहे हैं। सऊदी अरब ने अमेरिकी सेना को अपने किंग फहद एयर बेस (King Fahd Air Base) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी है। यह फैसला इस पूरे इलाके में सुरक्षा और शांति के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
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सऊदी अरब और UAE ने क्यों बदला अपना रुख?
खाड़ी देशों का मानना है कि ईरान के हमलों को लेकर अब उनका सब्र खत्म हो रहा है। पिछले कुछ समय में ऊर्जा ठिकानों और जहाजों पर हुए हमलों ने इन देशों की चिंता बढ़ा दी है। इस बदलाव के मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
- सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने साफ कहा है कि ईरान के हमलों को बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है।
- UAE ने दुबई में ईरान से जुड़े कई संस्थानों और नेटवर्क पर ताला लगा दिया है, जिसमें एक अस्पताल और क्लब भी शामिल है।
- सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman ईरान के दखल को रोकने के लिए कड़े फैसले लेने के करीब हैं।
- खाड़ी देशों के नेता अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं कि ईरान की सैन्य ताकत को पूरी तरह से कम किया जाए।
- बहरीन जैसे देशों से भी ईरान को निशाना बनाकर मिसाइलें दागे जाने की खबरें सामने आई हैं।
King Fahd Air Base का इस्तेमाल और युद्ध की तैयारी
सऊदी अरब ने ताइफ में मौजूद अपने किंग फहद एयर बेस को अमेरिकी सेना के लिए खोल दिया है। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है क्योंकि पहले रियाद अपनी जमीन या आसमान का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ करने की इजाजत नहीं देता था। यह एयर बेस भौगोलिक रूप से बहुत सुरक्षित जगह पर है और रेड सी (Red Sea) के पास होने के कारण यहाँ से सेना का आना-जाना आसान है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।
प्रवासियों और व्यापार पर क्या हो सकता है असर?
सऊदी अरब और UAE में रहने वाले लाखों भारतीयों और अन्य प्रवासियों के लिए यह खबर काफी अहम है। अगर युद्ध की स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों और उड़ानों पर पड़ सकता है। फिलहाल खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को काफी कड़ा कर दिया है। 22 मार्च 2026 को UAE समेत 20 से ज्यादा देशों ने ईरान के हमलों की कड़ी निंदा की थी और समुद्र में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने की मांग की थी। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अब यह सिर्फ वक्त की बात है कि कब सऊदी अरब आधिकारिक तौर पर इस संघर्ष का हिस्सा बनेगा।





