यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासियों के लिए अस्थायी वर्क वीज़ा (Temporary Work Visa) सिस्टम एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है. कतर यूनिवर्सिटी के लेक्चरर अब्दुल्ला मेत्कर बिन शबान अल हाجري ने बताया कि कैसे ये नियम प्रवासियों को कर्ज, शोषण और डिपोर्ट होने के डर में फंसा देते हैं. यह खबर उन लाखों प्रवासियों के लिए जरूरी है जो बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश जाते हैं.

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वर्क वीज़ा सिस्टम में क्या हैं बड़ी कमियां?

रिपोर्ट के मुताबिक, कई देशों में वर्क वीज़ा सिस्टम प्रवासियों को एक ही मालिक से जोड़ देता है. इसका मतलब है कि अगर कोई कर्मचारी अपने मालिक के बुरे व्यवहार से परेशान होकर नौकरी छोड़ता है, तो वह अपना कानूनी दर्जा और नौकरी दोनों खो देता है. भर्ती करने वाली एजेंसियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं, जो प्रवासियों से अवैध फीस वसूलती हैं और झूठे वादे करती हैं.

इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (IOM) ने एक मामला सामने लाया है जिसमें जर्मनी में एक मोल्दोवन महिला लारिसा को धोखे से ले जाया गया. वहां उसका पासपोर्ट छीन लिया गया और बिना वेतन के लंबे समय तक काम कराया गया. यह स्थिति प्रवासियों को मानव तस्करी और जबरन श्रम के प्रति संवेदनशील बनाती है.

अमेरिका में क्या है हाल और क्या सुधार होने चाहिए?

अमेरिका के नेशनल ह्यूमन ट्रैफिकिंग हॉटलाइन के डेटा पर आधारित Polaris की एक एनालिसिस में चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं. इसमें पाया गया कि लेबर ट्रैफिकिंग के शिकार हुए 72% लोग खास तरह के अस्थायी वीज़ा पर थे. इन वीज़ा श्रेणियों का विवरण नीचे टेबल में दिया गया है:

वीज़ा कैटेगरी काम का प्रकार
H-2A / H-2B खेती और मौसमी काम
J-1 एक्सचेंज प्रोग्राम
A-3 / G-5 घरेलू काम

एक्सपर्ट ने सुझाव दिया है कि भर्ती एजेंसियों पर सख्त जुर्माना लगाया जाना चाहिए और प्रवासियों से ली जाने वाली भर्ती फीस पर पूरी तरह बैन लगना चाहिए. साथ ही, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे प्रवासी अपनी कानूनी स्थिति खोए बिना नौकरी बदल सकें और शिकायत करने वालों को डिपोर्ट न किया जाए.

वीज़ा और बॉर्डर नियमों में क्या हुए नए बदलाव?

अमेरिकी श्रम विभाग ने 2 अप्रैल 2026 को एक नया प्रस्ताव पेश किया है, जिससे H-1B और PERM जैसे रोजगार वीज़ा के लिए न्यूनतम वेतन (Prevailing Wage) बढ़ाया जा सकता है. इस प्रस्ताव पर विचार के लिए सार्वजनिक टिप्पणी की अवधि 26 मई 2026 तक चलेगी. इसका असर उन लोगों पर पड़ेगा जो एंट्री या मिड-लेवल रोल के लिए आवेदन करते हैं.

वहीं यूरोपीय संघ (EU) ने 10 अप्रैल 2026 से अपना नया एंट्री/एग्जिट सिस्टम (EES) पूरी तरह लागू कर दिया है. अब गैर-यूरोपीय नागरिकों के आने-जाने का रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से रखा जाएगा, जिसमें उनके चेहरे की तस्वीर और उंगलियों के निशान (फिंगरप्रिंट्स) शामिल होंगे.

Aanya

Aanya is Ex IndiaTV Journalist. She covers Expats oriented news, views and interviews With deep understanding of what Hindi Speaking people needs as updates in daily life to avoid fines, comply rules and stay updated.