चांदी की चमक पिछले साल बेमिसाल रही। कीमतें आसमान छू रही थीं, लेकिन अब बाजार का रुख बदलता दिख रहा है। पिछले साल चांदी ने 2.54 लाख रुपये प्रति किलो का रिकॉर्ड स्तर छुआ था, जो अब घटकर घरेलू बाजार में 2.35 लाख रुपये के आसपास आ गया है। हालांकि, निवेशकों और आम जनता के लिए चिंता की बात यह है कि बाजार के जानकार अब इसमें और भी भारी गिरावट की आशंका जता रहे हैं। जहां साल 2025 में कीमतों में जबरदस्त उछाल आया था, वहीं अब भविष्य में एक बड़े क्रैश के संकेत मिल रहे हैं।
साल 2025 में 180% की ऐतिहासिक तेजी के बाद अब एक्सपर्ट्स जता रहे हैं 60% तक की भारी गिरावट की आशंका
चांदी की कीमतों में पिछले साल आई तेजी के पीछे कई ठोस कारण थे। साल 2025 में बढ़ती मांग और सप्लाई की कमी के चलते कीमतों में लगभग 180% की बढ़ोतरी देखी गई। इसका मुख्य कारण तकनीक में आया बदलाव था, जब बड़ी कंपनियों ने लिथियम-आयन बैटरी से सॉलिड-स्टेट बैटरी की तरफ रुख किया, जिससे इंडस्ट्रियल डिमांड अचानक बढ़ गई। इसके अलावा, अमेरिका और वेनेजुएला के बीच बढ़ते तनाव और पेरू व चाड जैसे देशों से सप्लाई में आई रुकावट ने भी कीमतों को हवा दी। वहीं, 1 जनवरी 2026 से चीन द्वारा चांदी के निर्यात पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध की खबरों ने भी बाजार में आग में घी का काम किया था।
इंडस्ट्री के लिए बहुत महंगी साबित हो रही है चांदी, अब तांबे जैसे सस्ते विकल्पों की तरफ तेजी से शिफ्ट हो रही हैं कंपनियां
बाजार के जानकारों का मानना है कि आज चांदी की कीमत एक ऐसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है, जहां से इसकी इंडस्ट्रियल डिमांड को खतरा पैदा हो गया है। अर्थशास्त्र का नियम है कि जब किसी कच्चे माल की लागत एक सीमा से अधिक बढ़ जाती है, तो उद्योग दूसरे विकल्पों की तलाश शुरू कर देते हैं। फोटोवोल्टिक सेल और सोलर पैनल बनाने वाली कंपनियां पहले ही चांदी को छोड़कर तांबे (Copper) की तरफ शिफ्ट हो चुकी हैं। बैटरी निर्माण में भी अब चांदी की जगह कॉपर बाइंडिंग तकनीक को अपनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। अगर यह बदलाव पूरी तरह लागू हो जाता है, तो सफेद धातु की मांग में भारी कमी आएगी, जिससे वित्त वर्ष 2027 के अंत तक कीमतों में 60% तक की गिरावट देखने को मिल सकती है।
इतिहास के पन्नों में छिपे हैं मंदी के संकेत, 1980 और 2011 की तरह एक बार फिर फूट सकता है तेजी का बुलबुला
अगर चांदी के पुराने रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो पता चलता है कि जब भी इसमें एक मजबूत ‘बुल रन’ (तेजी) आया है, उसके बाद बाजार धड़ाम से गिरा है। इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है। ऐसा ही मंजर 1980 में देखा गया था जब दुनिया के सिल्वर रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा जमा कर लिया गया था, जिसके बाद मार्जिन मनी बढ़ने से शॉर्ट-कवरिंग शुरू हुई और कीमतें लगभग 49.50 डॉलर से गिरकर 11 डॉलर पर आ गई थीं। साल 2011 में भी चांदी अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद 75% तक टूट गई थी। वर्तमान में भी एक्सचेंजों द्वारा मार्जिन मनी बढ़ाई जा रही है, जो लिक्विडिटी की कमी का संकेत है। यह पैटर्न इशारा कर रहा है कि आने वाले समय में चांदी में एक बार फिर बड़ी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की जा सकती है।





