खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब, कतर, मिस्र और ओमान ने मोर्चा संभाल लिया है। इन देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी तरह के सैन्य टकराव को रोकने के लिए पिछले 72 घंटों में एक बेहद सक्रिय और समन्वित राजनयिक अभियान चलाया है। इनका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में शांति बनाए रखना और एक ऐसे विनाशकारी संघर्ष को टालना है, जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला सकता है।
दोनों पक्षों को दिया कड़ा संदेश
इस कूटनीतिक पहल में अरब देशों ने अमेरिका और ईरान, दोनों को स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने अमेरिका से अपील की है कि वह ईरान पर हमले करने से बचे, क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। वहीं, दूसरी तरफ ईरान को भी सख्त चेतावनी दी गई है। अरब नेताओं ने ईरान को समझाया है कि अगर उसने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमला किया, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंध पूरी तरह बिगड़ सकते हैं।
तेल और व्यापार पर खतरे का डर
अरब देशों के इस विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक सुरक्षा है। खाड़ी देशों को डर है कि अगर युद्ध भड़का, तो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। साथ ही, तेल परिवहन के लिए महत्वपूर्ण रास्ता ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) खतरे में पड़ सकता है। मिस्र की चिंता थोड़ी अलग है; उसे डर है कि अगर ईरान में सरकार गिरती है या अस्थिरता आती है, तो इसका सीधा असर लाल सागर और स्वेज नहर पर पड़ेगा, जो मिस्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
ईरान नहीं, अब इजरायल बड़ा खतरा?
हाल के घटनाक्रमों ने अरब देशों की सोच में एक बुनियादी बदलाव ला दिया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को शायद छोड़कर, अब ज्यादातर अरब देश ईरान के बजाय इजरायल को क्षेत्र की स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने लगे हैं। इजरायल की अनियंत्रित आक्रामकता और क्षेत्रीय विस्तार की नीतियों ने अरब नेताओं को चिंतित कर दिया है। कुछ देशों को तो अब यह भी डर सताने लगा है कि भविष्य में वे खुद भी इजरायल के विस्तारवादी एजेंडे का निशाना बन सकते हैं।
कमजोर हो चुका है ईरान
अरब कूटनीति का एक तर्क यह भी है कि ईरान पहले से ही काफी कमजोर स्थिति में है। कड़े प्रतिबंधों, सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क के टूटने के कारण ईरान की ताकत काफी घट गई है। ऐसे में अरब देशों को लगता है कि ईरान के खिलाफ और अधिक सैन्य कार्रवाई करना न केवल गैर-जरूरी है, बल्कि यह उल्टा असर भी कर सकता है। एक अरब अधिकारी के मुताबिक, फिलहाल अमेरिका ने बातचीत के लिए समय दिया है, जिससे स्थिति थोड़ी शांत हुई है।
प्रमुख देश और उनकी चिंताएं
नीचे दी गई तालिका में उन प्रमुख देशों और उनकी विशिष्ट चिंताओं का विवरण है जो इस तनाव को कम करने में लगे हुए हैं:
| देश / समूह | मुख्य भूमिका | प्रमुख चिंताएं |
|---|---|---|
| सऊदी अरब, कतर, ओमान | अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता | होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और तेल निर्यात पर खतरा। |
| मिस्र | क्षेत्रीय स्थिरता की वकालत | लाल सागर और स्वेज नहर की सुरक्षा, जो अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। |
| संयुक्त अरब मोर्चे | युद्ध विरोधी संदेश | क्षेत्रीय युद्ध से आर्थिक विनाश और इजरायल का बढ़ता प्रभाव। |
Last Updated: 17 January 2026





