आस्था की राह में मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर हौसला बुलंद हो तो मंजिल मिल ही जाती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है बांग्लादेश के युवा अलीफ़ महमूद ने। उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए हवाई जहाज या गाड़ी का नहीं, बल्कि अपने पैरों का सहारा लिया। अलीफ़ ने लगभग 8,000 किलोमीटर की लंबी और कठिन पैदल यात्रा पूरी कर मक्का पहुंचकर उमराह अदा किया है। उनकी यह यात्रा आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है और लोगों के लिए हिम्मत की एक नई मिसाल बन गई है।
270 दिनों का लंबा सफर और हर दिन 35 किलोमीटर पैदल चलकर रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान
यह सफर किसी भी लिहाज से आसान नहीं था। अलीफ़ को मक्का पहुंचने में करीब 270 दिन यानी लगभग 9 महीने का समय लगा। इस दौरान उन्होंने तकरीबन 7,800 से 8,000 किलोमीटर की दूरी तय की। अपने लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने कड़ा अनुशासन बनाए रखा और हर दिन औसतन 30 से 35 किलोमीटर पैदल चले। उनकी यह निरंतरता और दृढ़ संकल्प ही था जिसने इतनी विशाल दूरी को भी छोटा साबित कर दिया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि इंसान की इच्छाशक्ति के आगे दूरी मायने नहीं रखती।
भारत, पाकिस्तान और ईरान होते हुए सदियों पुराने ऐतिहासिक रास्तों से गुजरी यह रूहानी यात्रा
अलीफ़ का यह सफर कई मुल्कों की सीमाओं को लांघते हुए पूरा हुआ। बांग्लादेश से अपनी यात्रा शुरू करने के बाद, उन्होंने भारत, पाकिस्तान, ईरान और कुवैत जैसे देशों को पार किया और अंत में सऊदी अरब की पवित्र धरती पर कदम रखा। अपनी इस यात्रा में उन्होंने जानबूझकर उन सदियों पुराने इस्लामी ऐतिहासिक मार्गों का अनुसरण किया, जिन पर पुराने जमाने में पैदल यात्री और काफिले चला करते थे। रास्ते में उन्हें पहाड़, रेगिस्तान और शहरों के अलग-अलग रास्तों से गुजरना पड़ा। विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के बीच से गुजरते हुए भी उनकी आस्था ने उन्हें कभी झुकने नहीं दिया।
मक्का पहुंचकर जब आंखों से छलक आए खुशी के आंसू, बोले- यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा संकल्प था
महीनों की थकान और लंबा सफर तय करने के बाद जब अलीफ़ पवित्र शहर मक्का पहुंचे और काबा के सामने खड़े हुए, तो वह पल उनके लिए भावुक कर देने वाला था। वहां पहुंचकर उन्होंने उमराह की रस्में पूरी कीं और अल्लाह का शुक्र अदा किया। उन्होंने अपनी इस उपलब्धि को ‘ड्रीम जर्नी’ (सपनों की यात्रा) बताया। उनका कहना है कि यह उनकी जिंदगी का अब तक का सबसे बड़ा संकल्प था। मक्का पहुंचने के बाद उनकी शारीरिक थकान, रूहानी सुकून के आगे फीकी पड़ गई।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई जज्बे की कहानी, लोगों ने कहा- यह आधुनिक दौर की बेमिसाल घटना है
अलीफ़ महमूद की इस यात्रा के वीडियो और तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। इंस्टाग्राम, फेसबुक और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म पर उनके वीडियो लाखों बार देखे जा चुके हैं। दुनियाभर के लोग कमेंट्स में उनकी हिम्मत और जज्बे को सलाम कर रहे हैं। हालांकि, इससे पहले भी केरल के शिहाब और पाकिस्तान के उस्मान अरशद जैसे युवाओं ने पैदल हज और उमराह की यात्राएं की हैं, लेकिन अलीफ़ की यह ताज़ा कामयाबी एक बार फिर यह संदेश देती है कि सच्ची लगन हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।





