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अब सवालों पर लोग लॉजिकल नहीं ऑप्शनल थिंकिंग करते हैं. बड़े परीक्षा पास करने वाले भी विचारशील हो अब इसकी उम्मीद छोड़ दीजिए.

जो परीक्षार्थी अपने विश्लेषण से कक्षा में क्रांति ला सकता था, उसे इस व्यवस्था ने चुप करा दिया — क्योंकि वह 'सही विकल्प' नहीं टिक कर पाया।

Lov Singh by Lov Singh
जून 8, 2025
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अब सवालों पर लोग लॉजिकल नहीं ऑप्शनल थिंकिंग करते हैं. बड़े परीक्षा पास करने वाले भी विचारशील हो अब इसकी उम्मीद छोड़ दीजिए.

Lov Singh · जून 8, 2025

एक समय था जब विश्वविद्यालयों से ज्ञान की रोशनी फूटती थी। आज वहीं से ऑप्शन A, B, C, D की सीरीज निकलती है। सोच, समझ, और विवेक अब सिर्फ उन शब्दों में बचे हैं जिन्हें हम किसी प्राचीन ग्रंथ में खोजते हैं। विश्वविद्यालयों का उद्देश्य कभी समाज को सोचने वाले नागरिक देना था। अब लक्ष्य है — नेट क्वालिफाई कर लेना। शिक्षक बनने का पैमाना अब वह नहीं जो समझा सके, बल्कि वह है जो 150 सवालों में से 120 टिक कर सके।

शिक्षा का पतन नहीं, अब वह खुद ही परीक्षा बन चुकी है।

मुक्तिबोध की आत्मा अगर आज के प्रश्नपत्र देखती, तो शायद वो भी “एक रटे-रटे की डायरी” लिखने पर मजबूर हो जाते। आपसे कोई नहीं पूछता कि ‘कला के तीन क्षण’ क्या हैं — आपसे पूछा जाता है कि ‘तीसरा क्षण कौन सा है, A, B, C या D?’ सोचने की आज़ादी तो कब की कट चुकी, अब तो सोचने की ज़रूरत भी नहीं बची।


बहुविकल्पीय सवाल, बहुविकल्पीय मशीनी जीवन की तैयारी करते हैं। छात्र को यह सिखाते हैं कि तुम्हारा मूल्य इस बात में नहीं है कि तुम क्या सोचते हो, बल्कि इस बात में है कि तुम्हें कोचिंग में क्या याद कराया गया।

UGC NET का प्रश्नपत्र अब हिंदी का टेस्ट नहीं, “गाइड कितनी बार पढ़ी है” का मापन है।

कविता को काटकर अर्थ पूछना ठीक वैसा है जैसे किसी शव का अंग निकालकर बताना कि वह प्रेम में था या क्रोध में। मम्मट, भामह, लुकाच, कॉडवेल — इन सभी नामों का मूल योगदान भले आपको न पता हो, लेकिन नाम पहचान लिए तो आप ‘पात्र’ हो गए!

सोचिए, जो परीक्षार्थी अपने विश्लेषण से कक्षा में क्रांति ला सकता था, उसे इस व्यवस्था ने चुप करा दिया — क्योंकि वह ‘सही विकल्प’ नहीं टिक कर पाया।

और शिक्षक? वे अब मूल्यांकनकर्ता नहीं रहे। वे अब ‘डेटा एंट्री ऑपरेटर’ हैं, जिन्हें आदेश है — ‘इतनी कॉपियाँ चेक करनी हैं, इतनी शीट भरनी हैं, इतनी रैंकिंग बनानी है।’ सोच पर नहीं, स्कोर पर भरोसा किया जाता है। शिक्षक को अब इतना ही अधिकार है कि वह NAAC की रिपोर्ट में ‘हाँ’ या ‘ना’ भर सके।

हम एक ऐसी शिक्षा नीति के पोषणकर्ता बन गए हैं जो छात्रों से उम्मीद करती है कि वे बिना देखे अंधी गली में दौड़ें — और फिर इसी अंधेपन को ‘मेरिट’ कहा जाता है।

निष्कर्ष में बस इतना ही कहूँगा: जो शिक्षा सोचने से डरती है, वह सिर्फ सिस्टम के लिए क्लर्क तैयार करती है, समाज के लिए विचारक नहीं। परीक्षा अगर सिर्फ मशीन जांच सकती है, तो सोचिए — शिक्षक और छात्र के बीच अब क्या शेष है? उत्तर: (C) – कुछ नहीं।

 

बाते मित्र हरिओम से हुए वार्तालाप पर आधारित.

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बिहार से हूँ। बिहार होने पर गर्व हैं। फर्जी ख़बरों की क्लास लगाता हूँ। प्रवासियों को दोस्त हूँ। भारत मेरा सबकुछ हैं। Instagram पर @nyabihar तथा [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं।

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