US-Iran विवाद में पाकिस्तान बना मध्यस्थ, सऊदी अरब में भेजी अपनी सेना, क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर
पाकिस्तान इस समय दुनिया के दो बड़े देशों, अमेरिका और ईरान के बीच शांति कराने की कोशिश कर रहा है। साथ ही उसने सऊदी अरब के साथ अपनी रक्षा प्रतिबद्धताओं को भी निभाया है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने क्षेत्रीय स्थिरता को सबसे ऊपर रखा है और वे जल्द ही सऊदी अरब और तुर्की का दौरा करेंगे।
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अमेरिका और ईरान की बातचीत में क्या हुआ?
इस्लामाबाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के बीच 11 अप्रैल को मुलाकात हुई थी। यह बातचीत 12 अप्रैल को खत्म हुई, लेकिन इसमें कोई बड़ा समझौता नहीं हो पाया। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच 22 अप्रैल तक के लिए युद्धविराम लागू है।
- अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों की घेराबंदी कर दी है।
- ईरान ने इस कदम को समुद्री डकैती बताया है।
- अमेरिका का कहना है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए।
सऊदी अरब में पाकिस्तान की सेना क्यों पहुंची?
11 अप्रैल को सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि पाकिस्तान की वायु सेना के लड़ाकू विमान और सहायता दल किंग अब्दुलअज़ीज़ एयर बेस पहुंच चुके हैं। यह तैनाती पिछले साल हुए Strategic Mutual Defence Agreement (SMDA) के तहत की गई है। इसका मुख्य मकसद दोनों देशों के बीच सैन्य तालमेल और तैयारियों को और मजबूत करना है।
ईरान की मुख्य मांगें क्या हैं?
ईरान ने शांति प्रक्रिया के लिए अमेरिका के सामने कुछ कड़ी शर्तें रखी हैं। ईरान चाहता है कि मध्य पूर्व के देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों से सेना पूरी तरह बाहर निकल जाए। इसके अलावा ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर अपने नियंत्रण को मान्यता देने और सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग की है।




