यमन (Yemen) से एक बहुत बड़ी खबर आ रही है जिसने पूरे मिडिल ईस्ट में हलचल मचा दी है। अगर आप सोच रहे थे कि वहां शांति होने वाली है, तो ज़रा रुकिए। 10 जनवरी 2026 को यमन की सरकार ने एक ऐसा ऐलान किया है जिसने यह साफ़ कर दिया है कि “तैयारी पूरी है!”
मामला यह है कि यमन की सरकार ने अब सऊदी अरब (Saudi Arabia) के साथ मिलकर एक ‘सुपर आर्मी प्लान’ तैयार किया है।
आइये, आसान भाषा में समझते हैं कि यह ‘सर्वोच्च सैन्य समिति’ क्या है और सऊदी अरब इसमें इतना पैसा क्यों लगा रहा है।
क्या है यह ‘सर्वोच्च सैन्य समिति’?
यमन के राष्ट्रपति नेतृत्व परिषद (PLC) के चेयरमैन, राशिद अल-अलीमी ने घोषणा की है कि एक नई ‘Supreme Military Committee’ का गठन किया गया है।
आसान शब्दों में कहें तो यह एक “वॉर रूम” (War Room) जैसा है जिसका रिमोट कंट्रोल सऊदी अरब के हाथ में होगा।
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मकसद: बिखरी हुई सरकारी सेनाओं को एकजुट करना (Unify), उन्हें आधुनिक हथियार देना और उन्हें लीड करना।
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चेतावनी: अल-अलीमी ने हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) को साफ़ संदेश दिया है—“या तो शांति से बात कर लो, वरना हम अगले राउंड के लिए तैयार हैं।”
💰 सऊदी अरब का ‘फुल स्पॉन्सरशिप’
इस पूरी कवायद में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसका सारा खर्चा सऊदी अरब उठाएगा।
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वेतन (Salaries): सैनिकों की सैलरी सऊदी देगा।
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बजट: हथियारों और लॉजिस्टिक्स का खर्चा सऊदी देगा।
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प्लानिंग: ऑपरेशन की कमान गठबंधन सेना (Coalition Forces) के पास होगी।
सऊदी अरब यमन की स्थिरता के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो:
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2024: $500 मिलियन दिए।
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2025: $368 मिलियन दिए।
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बड़ा पैकेज: इससे पहले $1.2 बिलियन का आर्थिक पैकेज भी दिया जा चुका है।
अंदरूनी कलह और ‘बड़े भाई’ की भूमिका
यह फैसला सिर्फ़ हूतियों से लड़ने के लिए नहीं, बल्कि यमन के अंदरूनी झगड़ों को सुलझाने के लिए भी है। हाल ही में यमन सरकार और STC (दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद – जिसे UAE का समर्थन प्राप्त है) के बीच काफी तनाव चल रहा था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी समर्थित सेनाओं ने हदरमौत (Hadramout), अल-महरा और अदन (Aden) में कई अहम जगहों पर कंट्रोल ले लिया है ताकि सरकार की पकड़ ढीली न पड़े। सऊदी अरब यहाँ एक “बड़े भाई” की भूमिका निभा रहा है ताकि देश टूटे नहीं।
🚨 आगे क्या होगा?
स्थिति अभी भी नाज़ुक है।
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रेड सी (Red Sea): हूती विद्रोही अभी भी लाल सागर में जहाजों पर हमले कर रहे हैं।
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वार्ता या युद्ध: अगर शांति वार्ता फेल होती है, तो यह नई समिति युद्ध के मैदान में हूतियों को जवाब देगी।
कुल मिलाकर, यमन में एक बार फिर से शतरंज की बिसात बिछ गई है और सऊदी अरब ने अपना वज़ीर चल दिया है।
यमन में जो कुछ भी हो रहा है (सऊदी समर्थित ‘सर्वोच्च सैन्य समिति’ का गठन और हूतियों के हमले), उसका सीधा असर भारत और लाल सागर (Red Sea) के रास्ते होने वाले व्यापार पर पड़ रहा है।
यह मामला सिर्फ़ यमन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपकी और हमारी जेब पर भी असर डाल सकता है। आइये, आसान भाषा में समझते हैं कि इसके क्या मायने हैं।

1. 🚢 लाल सागर (Red Sea) रूट पर क्या असर पड़ा है?
लाल सागर दुनिया का सबसे व्यस्त व्यापारिक रास्ता है जो स्वेज नहर (Suez Canal) के ज़रिए एशिया को यूरोप से जोड़ता है।
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रास्ता बदलना: हूतियों के हमलों के डर से, बड़े मालवाहक जहाजों ने अब लाल सागर से जाना बंद कर दिया है। वे अब ‘केप ऑफ गुड होप’ (अफ्रीका के नीचे से घूमकर) जा रहे हैं।
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दूरी और समय: इस नए और लम्बे रास्ते की वजह से यात्रा में 14 से 20 दिन ज़्यादा लग रहे हैं और दूरी करीब 6,000 किलोमीटर बढ़ गई है।
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किराया (Freight Rates): जहाजों का किराया (Freight Cost) दो से तीन गुना तक बढ़ गया है। साथ ही, बीमा (Insurance) का खर्च भी आसमान छू रहा है।
2. 🇮🇳 भारत पर इसका क्या असर होगा?
भारत के लिए यह खबर अच्छी नहीं है क्योंकि हमारा यूरोप और अमेरिका के साथ होने वाला ज़्यादातर व्यापार इसी रास्ते से होता है।
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महंगाई का खतरा:
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आयात (Imports): भारत बाहर से कच्चा तेल (Crude Oil), खाद (Fertilizers) और मशीनरी मंगाता है। रास्ता लंबा होने से ये चीज़ें महंगी हो सकती हैं, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीज़ल और खाने-पीने की चीज़ों के दाम पर पड़ सकता है।
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निर्यात (Exports): भारत से यूरोप जाने वाले बासमती चावल, चाय, कपड़े (Textiles) और दवाइयां (Pharma) भेजना अब महंगा और धीमा हो गया है। इससे भारतीय सामान विदेशी बाज़ार में महंगा हो जाएगा और बिक्री कम हो सकती है।
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सुरक्षा चिंताएं:
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भारतीय नाविकों और जहाजों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। हालाँकि, भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने अपने युद्धपोत (Warships) वहां तैनात किए हैं और कई जहाजों को पाइरेट्स और हमलों से बचाया भी है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।
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3. ⚠️ यमन की ‘नई आर्मी’ से क्या बदलेगा?
सऊदी अरब द्वारा ‘सर्वोच्च सैन्य समिति’ का गठन करना यह इशारा करता है कि अगर शांति वार्ता फेल हुई, तो यमन में युद्ध (War) फिर से भड़क सकता है।
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अगर युद्ध तेज़ हुआ, तो हूती विद्रोही लाल सागर में और ज़्यादा आक्रामक हो सकते हैं।
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इसका मतलब है कि यह ‘संकट’ (Crisis) अभी लंबा चलेगा, और हमें बढ़े हुए दाम और देरी की आदत डालनी पड़ सकती है।
यमन की यह लड़ाई अब सिर्फ़ एक देश की लड़ाई नहीं रही। अगर वहां शांति नहीं हुई, तो भारत को अपने व्यापार के लिए नए रास्ते (जैसे IMEC कॉरिडोर) और विकल्प तलाशने होंगे।




