काठमांडू: नेपाल में एक बार फिर राजशाही की वापसी का शोर तेज हो गया है। मार्च 2026 में होने वाले संसदीय चुनावों से ठीक पहले, काठमांडू की सड़कों पर राजतंत्र समर्थकों ने अपनी ताकत दिखाई है। देश से राजतंत्र खत्म होने और गणराज्य बनने के करीब दो दशक बाद भी पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थन में जनता का एक बड़ा हिस्सा लामबंद हो रहा है। शाही परिवार के समर्थकों ने राजधानी में एक विशाल रैली निकालकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से जनता का मोहभंग हो रहा है और वे स्थिरता के लिए वापस राजा की ओर देख रहे हैं।
शाह राजवंश के संस्थापक पृथ्वीनारायण शाह की प्रतिमा के सामने गूंजे ‘राजा को वापस लाओ’ के नारे, हजारों की भीड़ उमड़ी
नेपाल के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखने वाले और शाह राजवंश के संस्थापक पृथ्वीनारायण शाह की जयंती के मौके पर हजारों समर्थक काठमांडू में उनकी प्रतिमा के इर्द-गिर्द जमा हुए। इस दौरान माहौल पूरी तरह राजशाही के रंग में रंगा नजर आया। प्रदर्शनकारियों ने “हम राजा से प्यार करते हैं” और “राजा को वापस लाओ” जैसे गगनभेदी नारे लगाए। रैली में शामिल सम्राट थापा नामक एक प्रदर्शनकारी ने जनभावना को व्यक्त करते हुए कहा कि देश के पास अब राजा और राजतंत्र ही एकमात्र और अंतिम विकल्प बचा है। समर्थकों का मानना है कि देश जिस दिशा में जा रहा है, वहां स्थिति को संभालने के लिए राजशाही की बहाली अनिवार्य हो गई है।
‘जनरेशन Z’ आंदोलन के बाद बनी अंतरिम सरकार से भी लोगों का मोहभंग, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई न होने से नाराजगी
यह विरोध प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सितंबर 2025 में हुए उस बड़े ‘जनरेशन Z’ (युवा) आंदोलन के बाद राजतंत्रवादियों का पहला बड़ा शक्ति प्रदर्शन है, जिसने पुरानी सरकार को उखाड़ फेंका था। उस आंदोलन के बाद सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज सुशीला कार्की के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ था। हालांकि, जनता में इस बात को लेकर गहरा असंतोष है कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और खराब शासन जैसे मुद्दों पर अंतरिम सरकार ने भी अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई है। भ्रष्टाचार के मामलों में देरी और राजनीतिक अस्थिरता ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या 2008 में राजतंत्र को खत्म करना सही निर्णय था।
मार्च 2025 की हिंसा के बाद इस बार शांतिपूर्ण रहा प्रदर्शन, लेकिन चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरण बदलने के आसार
प्रशासन के लिए राहत की बात यह रही कि हजारों की भीड़ होने के बावजूद यह रैली पूरी तरह शांतिपूर्ण रही। पुलिस और दंगा नियंत्रण दस्ते एहतियात के तौर पर तैनात थे, लेकिन किसी भी तरह की हिंसा की खबर नहीं है। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि मार्च 2025 में हुई ऐसी ही एक रैली के दौरान दो लोगों की मौत हो गई थी। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की लोकप्रियता अभी भी बरकरार है और उनके समर्थक मानते हैं कि गणराज्य का प्रयोग नेपाल में विफल साबित हुआ है। मार्च 2026 के आगामी चुनावों को देखते हुए, यह रैली नेपाल की राजनीति में एक नए मोड़ का संकेत दे रही है, जहां राजशाही की बहाली एक मुख्य चुनावी मुद्दा बनकर उभर सकती है।




