संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने यमन से अपनी बची हुई सेना को पूरी तरह वापस बुला लिया है। इस वापसी में सोकोट्रा और पेरििम (Perim) जैसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण द्वीप भी शामिल हैं, जहां से समुद्री रास्तों पर नजर रखी जाती थी। दिसंबर 2025 के अंत से शुरू होकर जनवरी 2026 की शुरुआत तक चली इस प्रक्रिया ने यमन में UAE के प्रत्यक्ष सैन्य नियंत्रण को समाप्त कर दिया है। यह कदम सऊदी अरब के साथ बढ़ते तनाव और दक्षिणी यमन में प्रॉक्सी मिलिशिया को लेकर हुए विवाद के बाद उठाया गया है।
बाब अल-मंदब से हटी अमीराती पकड़
इस सैन्य वापसी के साथ ही बाब अल-मंदब जलमार्ग और सोकोट्रा द्वीपसमूह पर UAE का सीधा नियंत्रण खत्म हो गया है। बाब अल-मंदब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक है। अब इन क्षेत्रों में प्रभाव सऊदी अरब द्वारा समर्थित ताकतों, विशेष रूप से ‘प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल’ (PLC) की ओर स्थानांतरित हो रहा है। यमन से यह निकास अमीराती विदेश नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहां अब वे सीधे टकराव से बचते हुए अपनी सीमाओं से दूर प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करेंगे।
सऊदी अरब के साथ विवाद की जड़
साल 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू किया था, तो UAE उनका मुख्य भागीदार था। हालांकि, समय के साथ दोनों देशों के उद्देश्य अलग हो गए। UAE ने यमन में दक्षिणी अलगाववादी समूहों का समर्थन किया, जिनमें ‘सदन ट्रांजिशनल काउंसिल’ (STC), जायन्ट्स ब्रिगेड, एलीट फोर्सेज और नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज (NRF) शामिल हैं। इसके अलावा, UAE ने 2017 से सूडान के रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) के लड़ाकों को भी फंड किया। 2019 में UAE ने अपनी मुख्य सेना हटा ली थी, लेकिन रणनीतिक द्वीपों पर अपने सलाहकार और सैनिक छोड़े हुए थे, जो अब वापस जा चुके हैं।
दिसंबर 2025 की झड़पें और वापसी का फैसला
यमन से इस अचानक वापसी का मुख्य कारण दिसंबर 2025 में दक्षिणी यमन में हुई हिंसक झड़पें थीं। ये लड़ाइयां सऊदी समर्थित PLC मिलिशिया और UAE समर्थित STC बलों के बीच हुई थीं। सऊदी अरब, जो यमन को एक रखना चाहता है, ने अलगाववादी गतिविधियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। सऊदी दबाव के कारण UAE को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। हालांकि, जानकारों का मानना है कि अगर रियाद और अबू धाबी के बीच कोई सहमति बनती है, तो UAE अपने स्थानीय वफादार गुटों के जरिए अभी भी परोक्ष रूप से प्रभाव डाल सकता है।
यमन बनाम अफ्रीका: रणनीति में बदलाव
यमन से बाहर निकलने का मतलब यह नहीं है कि UAE क्षेत्र से गायब हो रहा है। अब उनका पूरा ध्यान अफ्रीका और हॉर्न ऑफ अफ्रीका (Horn of Africa) पर केंद्रित हो गया है। नीचे दी गई तालिका में UAE की बदलती रणनीति को समझा जा सकता है:
| पैरामीटर (Parameter) | यमन में स्थिति (Yemen Status) | अफ्रीका में रणनीति (Africa Strategy) |
|---|---|---|
| सैन्य उपस्थिति | सोकोट्रा और पेरििम से पूर्ण वापसी। | हॉर्न ऑफ अफ्रीका में सैन्य अड्डों को मजबूत करना। |
| प्राथमिक लक्ष्य | बागी गुटों और मिलिशिया का समर्थन। | लाल सागर और अरब सागर में सुरक्षा बनाए रखना। |
| मुख्य चुनौती | सऊदी अरब के साथ सीधा टकराव और तनाव। | नए सहयोगियों (अमेरिका/इज़राइल) के साथ विस्तार। |
भविष्य में खाड़ी देशों के समीकरण
इस घटनाक्रम के बाद सऊदी अरब की स्थिति यमन, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और अरब सागर में काफी मजबूत हो गई है। सऊदी अरब अब ईरान के साथ अपने सुधरते रिश्तों और PLC को पुनर्जीवित करके संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों को आगे बढ़ा सकता है। वहीं, विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी-अमीराती दरार क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच ‘गल्फ कोपरेशन काउंसिल’ (GCC) की एकता के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। अब यह देखना होगा कि क्या UAE सऊदी नेतृत्व के तहत काम करता है या अपने अमेरिकी और इजरायली सहयोगियों के साथ स्वतंत्र विस्तार की नीति अपनाता है।
Last Updated: 17 January 2026





