अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर ब्रिटेन ने जताई आपत्ति, लेबनान को शामिल करने की मांग, ट्रंप ने किया इनकार
अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के युद्धविराम को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खींचतान शुरू हो गई है. ब्रिटेन की विदेश मंत्री Yvette Cooper ने बयान दिया है कि शांति के इस समझौते में लेबनान को भी शामिल किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि लेबनान में इजरायल के हमले तुरंत रुकने चाहिए और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों का रास्ता पूरी तरह फ्री होना चाहिए. ब्रिटेन ने इस युद्धविराम को क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है लेकिन कुछ शर्तों पर असहमति जताई है.
क्या लेबनान को शांति समझौते में शामिल किया गया है?
इस सवाल पर दुनिया के बड़े नेताओं की राय अलग-अलग है. अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने साफ तौर पर कहा है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है. उनका कहना है कि लेबनान में हिजबुल्लाह की मौजूदगी की वजह से वहां इजरायली कार्रवाई जारी रह सकती है. दूसरी तरफ, ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian का मानना है कि लेबनान में युद्धविराम इस समझौते की सबसे पहली शर्त थी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने भी कहा था कि समझौते में लेबनान शामिल है, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है.
इजरायली हमले और क्षेत्र में बढ़ते तनाव की ताजा स्थिति
युद्धविराम की घोषणा के बावजूद लेबनान में हालात गंभीर बने हुए हैं. पिछले 24 घंटों में इजरायल ने बेरुत पर अब तक के सबसे बड़े हमले किए हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है. हमलों और युद्धविराम के नियमों पर चर्चा करने के लिए कुछ मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
| पक्ष | ताजा रुख और स्थिति |
|---|---|
| इजरायल | इजरायल का कहना है कि उसका मिशन हिजबुल्लाह को खत्म करना है और वह हमला जारी रखेगा. |
| ईरान | ईरान ने धमकी दी है कि अगर लेबनान पर हमले नहीं रुके तो वह समझौते से बाहर हो जाएगा. |
| संयुक्त राष्ट्र | UN महासचिव ने चेतावनी दी है कि इजरायली हमलों से अमेरिका-ईरान शांति समझौता टूट सकता है. |
| अमेरिका | उप-राष्ट्रपति JD Vance 10 अप्रैल को पाकिस्तान के दौरे पर जा रहे हैं ताकि ईरान के साथ बातचीत हो सके. |
ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की भी चेतावनी दी है, जिससे दुनिया भर में तेल की सप्लाई और व्यापार पर असर पड़ सकता है. इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच रॉकेट हमले जारी हैं, जिसने इस शांति समझौते की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब 10 अप्रैल को होने वाली बातचीत पर नजर टिकाए हुए है.





