गाजा युद्ध में AI सिस्टम का इस्तेमाल

आधुनिक युद्ध अब केवल हथियारों और सैनिकों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इसमें तकनीक और एल्गोरिदम भी एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। हाल के घटनाक्रमों में यह सामने आया है कि इजरायली सेना (IDF) गाजा संघर्ष के दौरान निगरानी और लक्ष्यों की पहचान के लिए उन्नत AI systems का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रही है। इन डिजिटल उपकरणों को सैन्य खुफिया जानकारी जुटाने और रणनीतिक फैसले लेने में एक अहम साधन माना जा रहा है।
किन-किन AI सिस्टम्स का हो रहा है इस्तेमाल?
मीडिया रिपोर्ट्स और सैन्य जानकारियों के अनुसार, इजरायली अभियानों में कई तरह के अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर और प्लेटफॉर्म्स शामिल हैं। इनमें प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:
- हब्सोरा (द गॉस्पेल): इस सिस्टम का उपयोग मुख्य रूप से संभावित ठिकानों और लक्ष्यों की पहचान करने के लिए किया जाता है।
- लैवेंडर: यह डेटाबेस के आधार पर संदिग्ध व्यक्तियों की सूचियां तैयार करता है और टारगेट रिकमेंडेशन देने में मदद करता है।
- सर्वर इन द स्काई (SITS): यह रियल-टाइम ड्रोन इंटेलिजेंस को प्रोसेस करने वाला एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है।
- स्काईआई (SkyEye): रक्षा क्षेत्र की कंपनी एल्बिट सिस्टम्स द्वारा विकसित यह प्लेटफॉर्म मिसाइल लॉन्च का विश्लेषण करने और व्यापक क्षेत्र में निगरानी रखने का काम करता है।
इन तकनीकों की क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस तरह के डिजिटल कमांड इंफ्रास्ट्रक्चर से प्रतिदिन सैकड़ों संभावित लक्ष्यों की पहचान करने की बात कही जाती है।
दस्तावेजी फिल्म और व्हिसिलब्लोअर के दावे
इन एआई टूल्स के इस्तेमाल को लेकर विवाद तब और गहरा गया जब 'NAZA' नामक एक दस्तावेजी फिल्म रिलीज हुई। इस फिल्म में सौ से अधिक व्हिसिलब्लोअर्स के बयान शामिल हैं, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि इन स्वचालित प्रणालियों के कारण संघर्ष के दौरान भारी संख्या में नागरिकों को नुकसान पहुंचा है।
वहीं, दूसरी ओर इजरायली सेना (IDF) ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है। सेना का कहना है कि घातक हमलों या लक्ष्यों के निर्धारण में कोई भी फैसला पूरी तरह से स्वचालित नहीं होता है। सभी अंतिम निर्णय मानवीय कर्मियों द्वारा ही लिए जाते हैं और सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में रहकर ही की जाती है ताकि नागरिकों को कम से कम नुकसान हो।
मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं
ह्यूमन राइट्स वॉच सहित दुनिया भर के कई कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस तरह के अंधाधुंध उपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। आलोचकों का तर्क है कि एल्गोरिदम पर अत्यधिक निर्भरता से आनुपातिकता और सैन्य आवश्यकता के सिद्धांतों को खतरा पैदा हो सकता है। इसके अलावा, जानकारों का यह भी मानना है कि कई बार मानवीय निगरानी केवल एक औपचारिक औपचारिकता बनकर रह जाती है, जिससे एआई द्वारा तैयार सूचियों को बिना गहराई से जांचे मंजूरी मिल जाती है।
तकनीकी जगत से भी इस पर प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ समय पहले माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर निगरानी और फोन कम्युनिकेशन के अनुवाद जैसे कार्यों में अपनी तकनीक के संभावित इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए कुछ क्लाउड और एआई उत्पादों तक पहुंच सीमित कर दी थी। बहरहाल, युद्ध के मैदान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यह बढ़ता दखल भविष्य के संघर्षों और मानवीय सुरक्षा को लेकर एक बड़ा बहस का मुद्दा बन गया है।