भारत और पाकिस्तान के अस्पतालों में आग की घटनाओं पर अल जज़ीरा का लेख, आम नागरिकों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल.

Sushma Kumari29 August 20262 min read19 viewsIndia
भारत और पाकिस्तान के अस्पतालों में आग की घटनाओं पर अल जज़ीरा का लेख, आम नागरिकों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल.

हाल ही में भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में स्वतंत्रता दिवस के जश्न के ठीक बाद हुई अस्पतालों की दर्दनाक घटनाओं ने पूरे सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। जाने-माने पत्रकार Vidya Krishnan ने Al Jazeera पर एक तीखा ओपिनियन लेख लिखा है, जिसमें दोनों देशों की सरकारों की प्राथमिकताओं पर बड़े सवाल खड़े किए गए हैं। इस लेख का शीर्षक 'India and Pakistan are united in spending citizen lives like pocket change' रखा गया है, जो यह बताता है कि कैसे दोनों देशों में आम जनता की जान की कीमत बहुत कम समझी जाती है और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी की जाती है।

अस्पतालों में आग लगने से गई मासूमों की जान

घटना की शुरुआत भारत से हुई जब महाराष्ट्र के अमरावती के एक सरकारी अस्पताल के एनआईसीयू में अचानक आग लग गई। इस भयानक हादसे में तीन नवजात शिशुओं की मौत हो गई और शुरुआती रिपोर्टों में इसका कारण एक खराब वेंटिलेटर को बताया गया। इस घटना के ठीक दो दिन बाद यानी 27 अगस्त 2026 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी PIMS Hospital में भी एक ऐसा ही बड़ा हादसा पेश आया। वहां अस्पताल के भीतर एयर कंडीशनर में जोरदार धमाका होने के बाद आग फैल गई, जिसकी चपेट में आने से 14 नवजात बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई। इन दोनों घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि दोनों पड़ोसी मुल्कों में सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी लाचार और कमजोर है।

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सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर तंज

पत्रकार Vidya Krishnan के इस विश्लेषण में सीधे तौर पर दोनों देशों की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर गहरी चोट की गई है। लेख में बताया गया है कि कैसे सरकारें परमाणु हथियारों और अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाने पर पानी की तरह पैसा बहाती हैं, लेकिन दूसरी तरफ अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों जैसी बेहद जरूरी जगहों पर आग से बचाव के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए जाते हैं। इस मामले में भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif समेत दोनों देशों की न्यायपालिका, मीडिया, समाज के जिम्मेदार लोगों और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

वही पुराना घिसा-पिटा सरकारी रवैया

दोनों ही देशों में इस तरह के बड़े हादसे होने के बाद प्रशासन और राजनेताओं का रवैया बिल्कुल एक जैसा ही देखने को मिला है। घटना के तुरंत बाद बड़े नेताओं की तरफ से गहरी संवेदनाएं व्यक्त की गईं, पीड़ित परिवारों को मुआवजे देने के बड़े-बड़े वादे किए गए और उच्च स्तरीय जांच तथा भविष्य में फायर सेफ्टी ऑडिट कराने की घोषणाएं कर दी गईं। हालांकि रिपोर्ट में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि इन रस्म अदायगी वाले बयानों के बावजूद जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं होता है। लचर बचाव कार्य, खराब निकासी यानी इवेक्यूएशन प्रोटोकॉल और प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा हमेशा देश के गरीब और कमजोर परिवारों को ही भुगतना पड़ता है, जिनके बच्चे सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आते हैं।

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